जिंदगी बहुत बड़ी नही थी,
जीने की कोशिश किए जा रहा था,
किसी कदम पर लगता था की खुश हूँ,
पर गम के आंसू पिए जा रहा था॥
फ़िर एक दिन आँख खुली अक्ल की,
देखा अंधेरे में भटक मैं,
अपनी जिंदगी में अपनों से,
अनजान दूरियां बढ़ा रहा था॥
बेनामी जिद्द में ऐसा अकडा था,
हर कदम पर टूटता जा रहा था,
कभी नींद नसीब होगी चैन की,
इसी इंतज़ार में नींदें उदा रहा था॥
टूटने का असर तो दिल पर हो रहा था,
चहरे पर झुर्रियां क्यूँ बढ़ता जा रहा था,
शायदना मिलने वाली मौत की उम्मीद में,
जिंदगी से हार कर भी, बस जिए जा रहा था॥
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पर एक उम्मीद है अभी बाकी,
अभी देखा है जिंदगी का आधा सच,
बाकी आधा तो देखना है हंसकर,
फ़िर क्या करूँगा इतनी जल्दी मरकर॥
नही-नही मैं अभी नही मरूँगा,
जिंदगी से अभी समझौता नही करूँगा,
उसने जितने तीर थे तरकस में चलाये,
पर मेरी निष्ठां को नही डिगा पाए॥
कल तो किसी ने नही देखा है जानता हूँ,
फ़िर आज क्यूँ मैं हार मानता हूँ,
हर राह पर मैं जीत तो नही सका,
पर अभी हारा नही हूँ यही मानता हूँ॥
मैं आऊंगा और सर उठा कर चलूँगा,
हर गली से अपनी विस्वास की ऊँगली पकड़ निकलूंगा,
तुम भी मिलोगे रस्ते पर कहीं, मेरे मुक्कदर,
इंतज़ार करो, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा।
हाँ, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।