खली किस कि कमी कि, रात नींद नहीं आई,
बाहर कि बरसात या पलकों कि, जो नींद नहीं आई,
लोग तो कह लेंगे पागल और हस लेंगे मुझ पर,
पर क्या थी उसकी बात जो नींद नहीं आई,
कोई भूला क्यूँ याद आया बरसो पर फिर से मुझको,
उसकी यादो कि खुमारी थी, या दर्द कि बरात जो नींद नहीं आई,
वो भुला न सका रात, बड़ी लम्बी थी वो रात,
आज कि रात हुई फिर से वही हालात और नींद नहीं आई.
उन्हें भूलने की थी जिद्द और मुझे मानाने की खलूस,
किस मोड़ पर जा अटकी मेरी सांस, जो नींद नहीं आई,
उनका रूठना भी वाजिब, मेरा पूछना भी गुनाह,
वो सज़ा थी या सौगात, जो नींद नहीं आई!
रचनाकार -
आनंद मिश्र