क्यूँ सोचता हूँ तेरे बारे में अब मैं,
सब कुछ पराया-पराया सा लगता है,
जाने कौन सा मंज़र देखा है दिल ने,
खोया-खोया सा घबराया सा लगता है॥
आंसू आते भी नही और रुकते भी नही,
सैलाब जैसे दबाया सा लगता है,
राहगुज़र की बात क्या करूँ मैं,
आज हर अपना, पराया सा लगता है॥
अब तो महिना गर्मी का चल रहा है,
फ़िर ठण्ड क्यूँ आया-आया सा लगता है,
कितने अकेले हो गए हम अपनी राहो में,
आज हर रिश्ता पराया सा लगता है॥
कहते हैं की आइना हकीकत दिखलाता है,
पर आज आइना भी घबराया सा लगता है,
फूल मेरे हाथों का पुराना तो नही,
फ़िर आज क्यूँ यह मुरझाया सा लगता है॥
क्यूँ कोसते हैं लोग अँधेरी रात को,
आज तो सूरज भी शरमाया सा लगता है,
थोडी चांदनी है चिटक रही मेरे आँगन,
क्यूँ यह आँगन पराया सा लगता है॥
अकेले हैं भगवान् मन्दिर में ऐसे,
दुनिया का जैसे सताया सा लगता है,
खेवट क्यूँ रुकता है बीच नदी में,
आज क्यूँ यह पानी पराया सा लगता है॥
भागना तो तू भी जानता है ना वक्त,
आज क्यूँ रुका सा, सिथलाया सा लगता है,
मेरे आंसुवो का वज़न ना करा कभी,
यही तो अपना है, बाकी पराया सा लगता है॥
किस किस को गिनूंगा अपने दुश्मनों में,
हर दोस्त में दुश्मन आया सा लगता है,
तेज़ धुप में आज मेरी ही परछाई,
काली रात का घाना साया सा लगता है॥
खुशियाँ बची हैं कितनी नही जानता आज,
क्यूँ यह गला भर आया सा लगता है,
क्यूँ खामोश है जुबान मेरी आज,
हलक का हर शब्द हिलाया सा लगता है॥
आते आते जुबान पर दिल की दास्ताँ,
लम्हा लम्हा चित्राय सा लगता है,
अब बादल के बरसने का कैसा इंतज़ार,
जब हर मौसम ही पराया सा लगता है॥
कुछ खोया है मैंने, क्या खोया है मैंने,
आज जिंदगी अँधेरी छाया सा लगता है,
आंसुवो को भी पनाह नही मिलती चेहरे पर,
आज अपना ही चेहरा पराया सा लगता है॥
हर एक को देखता हूँ बड़ी तमन्ना से,
आज तो धड़कन भी दुसरे से चुराया सा लगता है,
नींद तो अब आती नही हमें रातो में,
जागते देखा हर सपना भी पराया सा लगता है॥
अपने पापो का दोष क्यूँ दू दुसरो को,
आज अपना ही जिस्म पराया सा लगता है,
क्यूँ इतना तरस खता है चित्रगुप्त मुझपर,
कभी प्राण आया, कभी जाया सा लगता है॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Saturday, August 22, 2009
Monday, August 17, 2009
बरसात
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
एक बूँद फ़िर बारिश की,
तपती भू की तृष्णा बढ़ा गई,
दूर बिजली चमकी आकाश में,
वो देखो बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
खुशी के आगमन के पहले ही,
खुशियों की तैयारी छा गई,
एक और बूँद ठंडी सी,
धरती के दिल में समा गई...
आहा बरसात आ गई...
कुछ कच्चे आँगन के फलो को,
देखो कितना इंतज़ार करा गई,
पीपल के पत्तो से टपकी बूँद,
मिटटी की खुशबू बढ़ा गई...
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
आहा बरसात आ गई...
एक बूँद फ़िर बारिश की,
तपती भू की तृष्णा बढ़ा गई,
दूर बिजली चमकी आकाश में,
वो देखो बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
खुशी के आगमन के पहले ही,
खुशियों की तैयारी छा गई,
एक और बूँद ठंडी सी,
धरती के दिल में समा गई...
आहा बरसात आ गई...
कुछ कच्चे आँगन के फलो को,
देखो कितना इंतज़ार करा गई,
पीपल के पत्तो से टपकी बूँद,
मिटटी की खुशबू बढ़ा गई...
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
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