कल, इस बारिश में,
जब भींगे तनहा अकेले।
तुम याद आए....
बस याद आए....
कठौती में जमा हर बूँद
मेरी बेरुखी की दास्ताँ है।
बाकी बिखरे हुए कहते हैं, कितना.....
मुझे तुम याद आए.......
पानी में धुलती हरी हरी घास,
मिट्टी के गलियारे... और धुलती मिट्टी....
तेरे कदमो के निसान ढूंढेंगे।
तुम उन्हें भी कितना याद आए......
बारिश अब रुक चुकी है.....
सबकुछ कितना पवित्र और साफ़ है....
हरे हरे पत्ते .... हरे हरे रास्ते .....
सबकुछ कितना नया है......
बारिश की वो आखरी बूँद....
जो उस गुलाब से लिपटी हुई है....
जिसे इंतज़ार है..... तेरे लवो का जो...
हमेशा की तरह.....
आकर उन्हें चूमेंगे ..... और यह लाल गुलाब.....
शर्मा के गुलाबी हो जाएगा......
रचनाकार - नीरज पाठक।
Sunday, November 30, 2008
कुछ सवाल अपने वजूद से
दाग लगा जो दामन में
फ़िर उसे मिटाना क्या....
सब जानते हैं हम बुजदिल हैं तो,
वजूद अपना जताना क्या...
एहसास तो तुमको भी होगा दोस्त,
मेरे कसूर का,
तुम मानते ही नही,
तो तुम्हे बताना क्या....
आज फ़िर मैं,
खयालो में गुम हूँ,
जब से हूँ, अकेला हूँ,
अकेलेपन से घबराना क्या....
दुश्मन हूँ और,
कायर भी हूँ...
फ़िर मरना क्या,
और मिटाना क्या....
तेरे द्वार पर हम अपना,
दिल छोड़ जायेंगे,
बिन तेरे जिसकी,
धड़कन क्या, धडकाना क्या....
उलझ जाए मेरी परछाई,
तेरे साए में...
फ़िर जिस्मो का
लिपटना क्या, और सिमटना क्या...
जब दौड़ ही चुके हैं,
बुढापे की दौड़...
तो चेहरे की
झुर्रियों से शर्माना क्या....
अपने राहो की
मंजिल आज कोई नही,
फ़िर युहीं रुकना क्या,
और चले जाना क्या......
फ़िर उसे मिटाना क्या....
सब जानते हैं हम बुजदिल हैं तो,
वजूद अपना जताना क्या...
एहसास तो तुमको भी होगा दोस्त,
मेरे कसूर का,
तुम मानते ही नही,
तो तुम्हे बताना क्या....
आज फ़िर मैं,
खयालो में गुम हूँ,
जब से हूँ, अकेला हूँ,
अकेलेपन से घबराना क्या....
दुश्मन हूँ और,
कायर भी हूँ...
फ़िर मरना क्या,
और मिटाना क्या....
तेरे द्वार पर हम अपना,
दिल छोड़ जायेंगे,
बिन तेरे जिसकी,
धड़कन क्या, धडकाना क्या....
उलझ जाए मेरी परछाई,
तेरे साए में...
फ़िर जिस्मो का
लिपटना क्या, और सिमटना क्या...
जब दौड़ ही चुके हैं,
बुढापे की दौड़...
तो चेहरे की
झुर्रियों से शर्माना क्या....
अपने राहो की
मंजिल आज कोई नही,
फ़िर युहीं रुकना क्या,
और चले जाना क्या......
रचनाकार - आनंद मिश्रा।
गीत वही गाता हूँ....
कुछ अर्ज़ किया है,
कुछ दुखडा सुनाता हूँ....
आज रात नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....
तुम्हारे चेहरे पर कसक सी देखि,
चाहा तुम्हे मर्ज़ की दावा दिलाता हूँ.....
आज नए राह पर खड़ा हूँ....
पर गीत वही गाता हूँ......
चाहा था तुमको भी चाँद से देखूं,
हकीकत नही, सपनो की बात बताता हूँ....
आज हालात् नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....
कभी अपनी उमर तुम्हे दे दूँ...
कभी तेरी वफाई के राग सुनाता हूँ.....
आज बात नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....
मेरा मुक्कदर किस ने लिखा...
तुम्हे अपना मुक्कदर सुनाता हूँ...
आज मंजिल नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....
कुछ दुखडा सुनाता हूँ....
आज रात नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....
तुम्हारे चेहरे पर कसक सी देखि,
चाहा तुम्हे मर्ज़ की दावा दिलाता हूँ.....
आज नए राह पर खड़ा हूँ....
पर गीत वही गाता हूँ......
चाहा था तुमको भी चाँद से देखूं,
हकीकत नही, सपनो की बात बताता हूँ....
आज हालात् नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....
कभी अपनी उमर तुम्हे दे दूँ...
कभी तेरी वफाई के राग सुनाता हूँ.....
आज बात नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....
मेरा मुक्कदर किस ने लिखा...
तुम्हे अपना मुक्कदर सुनाता हूँ...
आज मंजिल नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....
रचनाकार - आनंद मिश्रा।
Saturday, November 29, 2008
मेरी पहली कविता - गोधरा कांड
संदार्व : गोधरा में दंगाइयों के कुकर्म के पाश्चात्य एक बालक की दास्ताँ
देखा, ना देखा,
देखा ना गया,
वर्तमान की सीढ़ी ऊपर
उठकर आगे देखा ना गया...
मरी माँ नही ममता पड़ी थी,
तन जिसका कुचला था,
याद आया मैं नग्न,
उसके आँचल में उछाला था...
आब्बा नही पितृत्व था वो,
परवान चढा आस्तित्व जिसका,
समझ ना सका मैं हित किसका,
अहित किसका और निहित किसका...
सिद्ध किए थे श्रेष्ठता धारो की,
तलवारों वारो और हथियारों की,
याद आया इस परिस्थिति में,
अहमियत त्याहारो की,
होली दिवाली इद्द मुहर्रम
और बाटी खुशियाँ यारो की....
ज्यों देखा फाटक से बाहर आकर,
थमी साँसें वहां अपनों को पाकर,
गला रुंध गया था मेरा,
विरहां के मारो को खाकर....
अंग प्रत्यंग यूँ बिखरे पड़े थे,
मनो सुर असुर अमृत को लड़ये थे,
देख दृश्य हृदये यूँ डोला, बोला,
असुरत्व मानवता पर भरी पड़े थे...
रोया खोया मैं ऊपर देखा,
पतझड़ में खोझा बहार,
शांत लहू की धारा से भरे,
बर्तन ले लेते थे उभार....
अपरिचित सी इस अंजुमन में,
मैं चीत्कार रहा था बारम्बार,
कोई तो पुचकारे मुझको भी,
बाहों में ले और दे अपनों का प्यार....
सोच रहा था क्या हुआ यह सब,
क्यूँ हुआ, कोई तो समझा दे,
रक्त एक और वक्त भी एक,
फ़िर मजहब अलग क्यूँ, कोई तो बतला दे.....
हे इश्वर क्या ऐसा है की,
अब भी हम में मानवता कम है,
मेरी आँखें तो पथरा गई हैं,
क्या तेरी आंखों में पानी कम है....
कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है....
बचपन को कन्धा दे आया,
अब बारी ए यौवन तेरा है.....
कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है.....
हे इश्वर तेरी सर्वश्रेस्ट कृति,
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है......
देखा, ना देखा,
देखा ना गया,
वर्तमान की सीढ़ी ऊपर
उठकर आगे देखा ना गया...
मरी माँ नही ममता पड़ी थी,
तन जिसका कुचला था,
याद आया मैं नग्न,
उसके आँचल में उछाला था...
आब्बा नही पितृत्व था वो,
परवान चढा आस्तित्व जिसका,
समझ ना सका मैं हित किसका,
अहित किसका और निहित किसका...
सिद्ध किए थे श्रेष्ठता धारो की,
तलवारों वारो और हथियारों की,
याद आया इस परिस्थिति में,
अहमियत त्याहारो की,
होली दिवाली इद्द मुहर्रम
और बाटी खुशियाँ यारो की....
ज्यों देखा फाटक से बाहर आकर,
थमी साँसें वहां अपनों को पाकर,
गला रुंध गया था मेरा,
विरहां के मारो को खाकर....
अंग प्रत्यंग यूँ बिखरे पड़े थे,
मनो सुर असुर अमृत को लड़ये थे,
देख दृश्य हृदये यूँ डोला, बोला,
असुरत्व मानवता पर भरी पड़े थे...
रोया खोया मैं ऊपर देखा,
पतझड़ में खोझा बहार,
शांत लहू की धारा से भरे,
बर्तन ले लेते थे उभार....
अपरिचित सी इस अंजुमन में,
मैं चीत्कार रहा था बारम्बार,
कोई तो पुचकारे मुझको भी,
बाहों में ले और दे अपनों का प्यार....
सोच रहा था क्या हुआ यह सब,
क्यूँ हुआ, कोई तो समझा दे,
रक्त एक और वक्त भी एक,
फ़िर मजहब अलग क्यूँ, कोई तो बतला दे.....
हे इश्वर क्या ऐसा है की,
अब भी हम में मानवता कम है,
मेरी आँखें तो पथरा गई हैं,
क्या तेरी आंखों में पानी कम है....
कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है....
बचपन को कन्धा दे आया,
अब बारी ए यौवन तेरा है.....
कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है.....
हे इश्वर तेरी सर्वश्रेस्ट कृति,
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है......
रचनाकार - आनंद मिश्रा।
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