Sunday, November 30, 2008

कुछ सवाल अपने वजूद से

दाग लगा जो दामन में
फ़िर उसे मिटाना क्या....
सब जानते हैं हम बुजदिल हैं तो,
वजूद अपना जताना क्या...
एहसास तो तुमको भी होगा दोस्त,
मेरे कसूर का,
तुम मानते ही नही,
तो तुम्हे बताना क्या....

आज फ़िर मैं,
खयालो में गुम हूँ,
जब से हूँ, अकेला हूँ,
अकेलेपन से घबराना क्या....
दुश्मन हूँ और,
कायर भी हूँ...
फ़िर मरना क्या,
और मिटाना क्या....

तेरे द्वार पर हम अपना,
दिल छोड़ जायेंगे,
बिन तेरे जिसकी,
धड़कन क्या, धडकाना क्या....
उलझ जाए मेरी परछाई,
तेरे साए में...
फ़िर जिस्मो का
लिपटना क्या, और सिमटना क्या...

जब दौड़ ही चुके हैं,
बुढापे की दौड़...
तो चेहरे की
झुर्रियों से शर्माना क्या....
अपने राहो की
मंजिल आज कोई नही,
फ़िर युहीं रुकना क्या,
और चले जाना क्या......

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

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