कल, इस बारिश में,
जब भींगे तनहा अकेले।
तुम याद आए....
बस याद आए....
कठौती में जमा हर बूँद
मेरी बेरुखी की दास्ताँ है।
बाकी बिखरे हुए कहते हैं, कितना.....
मुझे तुम याद आए.......
पानी में धुलती हरी हरी घास,
मिट्टी के गलियारे... और धुलती मिट्टी....
तेरे कदमो के निसान ढूंढेंगे।
तुम उन्हें भी कितना याद आए......
बारिश अब रुक चुकी है.....
सबकुछ कितना पवित्र और साफ़ है....
हरे हरे पत्ते .... हरे हरे रास्ते .....
सबकुछ कितना नया है......
बारिश की वो आखरी बूँद....
जो उस गुलाब से लिपटी हुई है....
जिसे इंतज़ार है..... तेरे लवो का जो...
हमेशा की तरह.....
आकर उन्हें चूमेंगे ..... और यह लाल गुलाब.....
शर्मा के गुलाबी हो जाएगा......
रचनाकार - नीरज पाठक।
No comments:
Post a Comment