Thursday, April 15, 2010

ग़ज़ल लिखता हूँ

दर्द-ए-वह्शत: पर ग़ज़ल लिखता हूँ,
पहले जैसा कहाँ मैं आज-कल लिखता हूँ|

फुरकत के पल दो पल तुझ-संग बिताये याद हैं,
पर कलम उठा कर वही, तन्हाई के पल लिखता हूँ|

तुम देखते हो चेहरे की हंसी को आशुफ्तः: से,
मैं आँखों की नमी, और उनकी हलचल लिखता हूँ|

वफ़ा की ना की, किसे पड़ी है वाहिमः:-ए-बाज़ार में,
वज्द की कहानी तू लिख, मैं हर्जः-ए-ग़ज़ल लिखता हूँ|

दर्द-ए-वह्शत: पर ग़ज़ल लिखता हूँ,
पहले जैसा मैं कहाँ आज-कल लिखता हूँ||

रचनाकार – ‘आनंद मिश्र’

शब्दार्थ:
वह्शत: – अकेलापन, loneliness
आशुफ्तः: – असमंजस में, perplexed, confused
वाहिमः: – दिखावटी, fancy, whim, imagination
वज्द: – बे-इन्तेहा प्यार, excessive love, ecstasy, rapture
हर्जः: – फ़िज़ूल, nonsense, absurd, vain, frivolous

Monday, April 5, 2010

शक़ कि शाख़ पर...

शक़ कि शाख़ पर,
बैठा है मात ताक़ पर,
दे ग़र हवा भी तू तो,
झुलसेगा तू ही आग पर॥

भाग ले, जाग ले,
न बैठ किसी फ़िराक पर,
ले चला है कारवां जो तू,
थम जाये न कहीं राख पर॥

कर्म से न विमूढ़ हो,
फ़र्ज़ से न दूर हो,
है रोष ग़र फ़िरोज़ में तो,
लिख नाम इसी आग पर॥

पग बढ़ा, न डगमगा,
है अकेला नहीं तू राह पर,
जो टूट गया, सो छूट गया,
बस लाशें थमी हैं आह पर॥

ग़र्क कि शाख़ पर,
बैठा है मौत ताक़ पर,
ढूंढ तेरी हस्ती का चर्चा,
डूब जाये न इसी मज़ाक पर॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ॥

Tuesday, March 23, 2010

पुनः इश्क का नया दांव मत दो

मुझे उमीदों के घाव मत दो,
जुल्फों कि घनी छाँव मत दो,
दर्द का प्याला भरा है अभी,
स्नेह कि मीठी अलाव मत दो।

दूर अभी तुमसे कहाँ हुआ हूँ,
रिश्तों को अभी से पड़ाव मत दो,
रंजिशें, साजिशें बहुत देखी,
किलकारी शब्दों का हिसाव मत दो।

दर्द दो, हया दो, तम दो त्याग दो,
खरी खोटी और जली बद्दुआ दो,
पलकों कि नशीली झुकाव मत दो,
पुनः इश्क का नया दांव मत दो॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ॥

Friday, March 5, 2010

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ...

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी आँखों में उतर जाऊ,

अनचाहा शोर है गूंजता एक तरफ,
और उनकी धडकनों कि ताल एक तरफ,
एक मधुर अन्तरंग मैं बन जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी धडकनों में बिखर जाऊ॥

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी आँखों में उतर जाऊ

खटक रहा कांटा मन में दुनिया का,
वक़्त के बे-वक़्त नज़ारें छोड़,
एक बे-वाक् आवारगी में बदल जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी सांसों में पिघल जाऊ

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी आँखों में उतर जाऊ


रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ।

Tuesday, March 2, 2010

कुछ अँधेरा क्यूँ है...

दर्द-ए-तन्हाई का और आलम क्या बताएं,
मुद्दतें हो गई हैं, हमें मुस्कुराये,
मेरी ख़ामोशी को भी आजकल शिकायत है मुझसे,
राज़ उनसे कहें, या तनहा छोड़ जायें॥

कुछ तम सा था कभी तेरे आने से मन में,
सबकुछ ख़तम सा है तेरे जाने के बाद,
दो-पहर कि धूप भी अब, अँधेरा दूर नहीं करती,
तेरी यादों के छाए से दूर जायें तो कैसे जायें॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ।

Friday, February 19, 2010

हुनर !!

जाने उस शक्श को कैसा ये हुनर आता है,
रात होती है तो आँखों में उतर आता है,
मैं उस के ख्याल से बचकर कहाँ जाऊं,
वो मेरी सोच कि हर राह पर नज़र आता है॥

आँखों में बनती ख्याल-ए-तस्वीर उसकी,
कभी फूल तो कभी संगीत-ए-ग़ज़ल आता है,
डूबे तो हर गहराई से निकल आयेंगे आशात्,
तेरी आँखों में अथाह समंदर नज़र आता है॥

रचनाकार - अज्ञात एंव 'आनंद मिश्रा' ।