शक़ कि शाख़ पर,
बैठा है मात ताक़ पर,
दे ग़र हवा भी तू तो,
झुलसेगा तू ही आग पर॥
भाग ले, जाग ले,
न बैठ किसी फ़िराक पर,
ले चला है कारवां जो तू,
थम जाये न कहीं राख पर॥
कर्म से न विमूढ़ हो,
फ़र्ज़ से न दूर हो,
है रोष ग़र फ़िरोज़ में तो,
लिख नाम इसी आग पर॥
पग बढ़ा, न डगमगा,
है अकेला नहीं तू राह पर,
जो टूट गया, सो छूट गया,
बस लाशें थमी हैं आह पर॥
ग़र्क कि शाख़ पर,
बैठा है मौत ताक़ पर,
ढूंढ तेरी हस्ती का चर्चा,
डूब जाये न इसी मज़ाक पर॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ॥
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