दर्द-ए-वह्शत: पर ग़ज़ल लिखता हूँ,
पहले जैसा कहाँ मैं आज-कल लिखता हूँ|
फुरकत के पल दो पल तुझ-संग बिताये याद हैं,
पर कलम उठा कर वही, तन्हाई के पल लिखता हूँ|
तुम देखते हो चेहरे की हंसी को आशुफ्तः: से,
मैं आँखों की नमी, और उनकी हलचल लिखता हूँ|
वफ़ा की ना की, किसे पड़ी है वाहिमः:-ए-बाज़ार में,
वज्द की कहानी तू लिख, मैं हर्जः-ए-ग़ज़ल लिखता हूँ|
दर्द-ए-वह्शत: पर ग़ज़ल लिखता हूँ,
पहले जैसा मैं कहाँ आज-कल लिखता हूँ||
रचनाकार – ‘आनंद मिश्र’
शब्दार्थ:
वह्शत: – अकेलापन, loneliness
आशुफ्तः: – असमंजस में, perplexed, confused
वाहिमः: – दिखावटी, fancy, whim, imagination
वज्द: – बे-इन्तेहा प्यार, excessive love, ecstasy, rapture
हर्जः: – फ़िज़ूल, nonsense, absurd, vain, frivolous
1 comment:
Yoy rokss Anand...
Well done.........
Post a Comment