Saturday, November 29, 2008

मेरी पहली कविता - गोधरा कांड

संदार्व : गोधरा में दंगाइयों के कुकर्म के पाश्चात्य एक बालक की दास्ताँ

देखा, ना देखा,
देखा ना गया,
वर्तमान की सीढ़ी ऊपर
उठकर आगे देखा ना गया...

मरी माँ नही ममता पड़ी थी,
तन जिसका कुचला था,
याद आया मैं नग्न,
उसके आँचल में उछाला था...

आब्बा नही पितृत्व था वो,
परवान चढा आस्तित्व जिसका,
समझ ना सका मैं हित किसका,
अहित किसका और निहित किसका...

सिद्ध किए थे श्रेष्ठता धारो की,
तलवारों वारो और हथियारों की,
याद आया इस परिस्थिति में,
अहमियत त्याहारो की,
होली दिवाली इद्द मुहर्रम
और बाटी खुशियाँ यारो की....

ज्यों देखा फाटक से बाहर आकर,
थमी साँसें वहां अपनों को पाकर,
गला रुंध गया था मेरा,
विरहां के मारो को खाकर....

अंग प्रत्यंग यूँ बिखरे पड़े थे,
मनो सुर असुर अमृत को लड़ये थे,
देख दृश्य हृदये यूँ डोला, बोला,
असुरत्व मानवता पर भरी पड़े थे...

रोया खोया मैं ऊपर देखा,
पतझड़ में खोझा बहार,
शांत लहू की धारा से भरे,
बर्तन ले लेते थे उभार....

अपरिचित सी इस अंजुमन में,
मैं चीत्कार रहा था बारम्बार,
कोई तो पुचकारे मुझको भी,
बाहों में ले और दे अपनों का प्यार....

सोच रहा था क्या हुआ यह सब,
क्यूँ हुआ, कोई तो समझा दे,
रक्त एक और वक्त भी एक,
फ़िर मजहब अलग क्यूँ, कोई तो बतला दे.....

हे इश्वर क्या ऐसा है की,
अब भी हम में मानवता कम है,
मेरी आँखें तो पथरा गई हैं,
क्या तेरी आंखों में पानी कम है....

कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है....
बचपन को कन्धा दे आया,
अब बारी ए यौवन तेरा है.....

कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है.....
हे इश्वर तेरी सर्वश्रेस्ट कृति,
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है......

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

1 comment:

Anonymous said...

अंग प्रत्यंग यूँ बिखरे पड़े थे,
मनो सुर असुर अमृत को लड़ये थे,
देख दृश्य हृदये यूँ डोला, बोला,
असुरत्व मानवता पर भरी पड़े थे...


Nice lines .........