Wednesday, March 11, 2009

मैंने कब रोका है...

मैंने कब रोका है तूफानों को चलने से,
मैंने कब रोका है अरमानो को पिघलने से,
मैं तो कहता हूँ लगा दो आग जितनी दिल में हो,
मैं तो कहता हूँ दिखा दो प्यार जितनी दिल में हो॥

देखना वक्त ख़ुद-ब्-ख़ुद तुम्हारा गुलाम हो जाएगा,
एक कसक सी जागेगी दिल में और दिल मचल जाएगा,
आरजू तो तुम्हारी भी यही है इजहार-ऐ-काफिर,
फरमा के देखो, दिल तो दिल है, पत्थर भी पिघल जाएगा॥

कौन रोका है मुझे आसमा पर चढ़ने से,
पर तुम भी नही आई, तन्हाई में बुलाने से,
तमन्ना थी की आखरी साँस में तुम्हारा आगाज़ हो,
अब कफ़न भी तनहा रहता है तेरे चले जाने से॥

- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'

Tuesday, March 10, 2009

दोस्तों के बीच छिटके कुछ पत्र

पहला पत्र : अमित सिन्हा द्वारा

"क्यूँ रखूं अपने कलम में स्याही,
जब कोई अरमां दिल में मचलता नही।
ना जाने क्यूँ सब शक़ करते हैं मुझपर,
जब कोई मुस्कराते चहरे के दर्द को समझता नही।
अगर मिले खुदा तो उससे मांगूंगा अपना प्यार,
पर सुना है कि मरने से पहले वो मिलता नही॥"


दूसरा पत्र : नीरज पाठक द्वारा

"एक दुआ खुदा से ये भी...

रहे हर पल मेरे कलम में स्याही,
कुछ कहानी तुमने लिखी कुछ मैंने बनाई।
शक़ की बुनियाद गहरी नही होती मेरे दोस्त,
मोह्हबत का दस्तूर ही है जुदाई।
खुदा क्या दिलाएगा मुझे मेरा प्यार,
तक़दीर से गिला उसको हो, जो मेरी न हो पाई।"



तीसरा पत्र : आनंद मिश्रा द्वारा

"क्या दुआ करुँ, क्या दवा करूँ...

क्या खुदा और क्या खुदा की खुदाई,
जब मेरे हाथ का कलम ही टूटा है,
तो कैसी कहानी और किस काम की स्याही।
मोह्हबत का राज़ बताने वाले ये भी बता,
किसने लिखी किस्मत और क्यूँ लिखी जुदाई।
चर्चा तो मेरे मरने पर भी बंद ना होगा,
फ़िर कैसा प्यार, और कैसी वफाई।"


- अपनी राय अवश्य दें -- धन्यबाद ।

कुछ दर्द भरे नगमे

तेरे रोने की ख़बर मेरे आंखों से यूँ निकलती है,
जैसे कोई दुल्हन बिदाई के आंसू में पिघलती है।
किसी कोने से लिपट के देखूंगा की ये मोती कितने महेंगे है,
और देखूंगा की क्या मेरी गरीबी इनको कभी खरीद पायेगी?

कुछ ना होने पर मेरी जिरह का जुगाड़ यही होगा,
आज ताज़ा है यह मोती, जरुर महंगा होगा।
मुझे देख कोई हँसता नही अब गलियों में,
हर मोड़ पर ये मोतियाँ कौडियों के भाव बिकती हैं।

सौदा तो मेरा कभी ना हो सका बाज़ार में,
आज तेरी बेवफाई को बिकते देखा इश्तेहार में।
चाहता था के सबकुछ खर्च कर तुझको पा लूँ,
ये ख्वाब था, ख्वाब ही रहा की तुझे अपना लूँ।

दूर की धुंध में अब दानिस्ता ही कोई चिंगारी दिखती है,
यह नई दुनिया है, यहाँ चलचित्र नही, चरित्र बिकती है।
हर घड़ी अपने को हताश अपने इतिहास में देखता हूँ,
पर तेरे मोतियों के पर्दों पार, पूरी दुनिया अँधेरी दिखती है।

तन्हाई का बादल हमें ही क्यूँ भिंगोता है,
क्यूँ तेरी तस्वीर से ही हमेशा गुफ्तगू होता है।
वक्त का हम और कर्ज़दार नही होना चाहते,
तुझसे जुदा हैं, पर तेरी जुदाई का गम नही खोना चाहते॥

- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'