पहला पत्र : अमित सिन्हा द्वारा
"क्यूँ रखूं अपने कलम में स्याही,
जब कोई अरमां दिल में मचलता नही।
ना जाने क्यूँ सब शक़ करते हैं मुझपर,
जब कोई मुस्कराते चहरे के दर्द को समझता नही।
अगर मिले खुदा तो उससे मांगूंगा अपना प्यार,
पर सुना है कि मरने से पहले वो मिलता नही॥"
दूसरा पत्र : नीरज पाठक द्वारा
"एक दुआ खुदा से ये भी...
रहे हर पल मेरे कलम में स्याही,
कुछ कहानी तुमने लिखी कुछ मैंने बनाई।
शक़ की बुनियाद गहरी नही होती मेरे दोस्त,
मोह्हबत का दस्तूर ही है जुदाई।
खुदा क्या दिलाएगा मुझे मेरा प्यार,
तक़दीर से गिला उसको हो, जो मेरी न हो पाई।"
तीसरा पत्र : आनंद मिश्रा द्वारा
"क्या दुआ करुँ, क्या दवा करूँ...
क्या खुदा और क्या खुदा की खुदाई,
जब मेरे हाथ का कलम ही टूटा है,
तो कैसी कहानी और किस काम की स्याही।
मोह्हबत का राज़ बताने वाले ये भी बता,
किसने लिखी किस्मत और क्यूँ लिखी जुदाई।
चर्चा तो मेरे मरने पर भी बंद ना होगा,
फ़िर कैसा प्यार, और कैसी वफाई।"
- अपनी राय अवश्य दें -- धन्यबाद ।
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