तेरे रोने की ख़बर मेरे आंखों से यूँ निकलती है,
जैसे कोई दुल्हन बिदाई के आंसू में पिघलती है।
किसी कोने से लिपट के देखूंगा की ये मोती कितने महेंगे है,
और देखूंगा की क्या मेरी गरीबी इनको कभी खरीद पायेगी?
कुछ ना होने पर मेरी जिरह का जुगाड़ यही होगा,
आज ताज़ा है यह मोती, जरुर महंगा होगा।
मुझे देख कोई हँसता नही अब गलियों में,
हर मोड़ पर ये मोतियाँ कौडियों के भाव बिकती हैं।
सौदा तो मेरा कभी ना हो सका बाज़ार में,
आज तेरी बेवफाई को बिकते देखा इश्तेहार में।
चाहता था के सबकुछ खर्च कर तुझको पा लूँ,
ये ख्वाब था, ख्वाब ही रहा की तुझे अपना लूँ।
दूर की धुंध में अब दानिस्ता ही कोई चिंगारी दिखती है,
यह नई दुनिया है, यहाँ चलचित्र नही, चरित्र बिकती है।
हर घड़ी अपने को हताश अपने इतिहास में देखता हूँ,
पर तेरे मोतियों के पर्दों पार, पूरी दुनिया अँधेरी दिखती है।
तन्हाई का बादल हमें ही क्यूँ भिंगोता है,
क्यूँ तेरी तस्वीर से ही हमेशा गुफ्तगू होता है।
वक्त का हम और कर्ज़दार नही होना चाहते,
तुझसे जुदा हैं, पर तेरी जुदाई का गम नही खोना चाहते॥
- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'
1 comment:
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