आम चुनाव मुह खोले खड़ा है, यह वो समय है जब हमारा एक फैसला हमारे लिए आने वाले पाँच वर्षो तक अपनी छाप छोड़ता रहेगा। चाहे बुरा हो या भला हो, पर इस चुनाव का आसार तो सिर्फ़ हम पर ही पड़ेगा, क्यूँ की हम ही तो मध्यम वर्ग के इंसान हैं। हाँ मध्यम जिसकी सिर्फ़ एक जिम्मेदारी है यहाँ के लोकतंत्र में, वो है वोट डालने की। और एक जिम्मेदारी जो मध्यम बर्ग ने उठा राखी है वो है, पाँच साल तक इंतज़ार करने की की अगला वोट कब डालेंगे जब उनको कुछ लोग मुफ्त में उपहार और भोजन देंगे। वैसे भी, इसके अलावा और कुछ की समझ हो भी नही पाई है हम मध्यम बर्ग को। तो, सवाल यह है की आप, यानी मध्यम्बर्ग किस मुद्दे को ध्यान में रख कर वोट कर रहा है? उदहारण के लिए मैं कुछ मुद्दों को याद दिला रहा हूँ जो आप के वोट देने की वज़ह हो सकते हैं शायद। बेरोज़गारी, महंगाई, धर्म, जाती, विकाश, कोटा, आरक्षण, गरीबी इत्यादि-इत्यादि...
मैंने बहुत सोचा, और सोचा तो यह पाया की हर हालत में हमें इस बार वोट डालने के लिए सबसे पहले हमें अपनी समझ से यह साबित करने के लिए वोट डालना है की हम बदल रहे हैं। हम अब किसी के हात के मोहरे नही हैं, और अपनी भलाई के लिए क्या करने और क्या नही करने की जरुरत है हम जानते हैं। किसी को यह बताने की या जताने की जरुरत नही है की हम किस को और क्यूँ वोट डालें। इस बार वोट डालने का सबसे बड़ा मुद्दा यह है की हम अब साधारण लोग नही हैं, या यूँ कहें की कोई विशिस्ट लोग नही हैं जो हमारा प्रतिनिधित्वा करेंगे। हम में से ही कोई एक हमारा प्रतिनिधि बनेगा और उसके नाम से हम नही, बल्कि हमारे विकाश से वो पहचाना जाएगा। मेरी पहली प्राथमिकता यह है की हर व्यक्ति इतना समझदार बने की सही और ग़लत का अन्तर वो बहुत आसानी से समझ सके। जरुरत आधिकार की नही है, बल्कि जरुरत पहले से ही प्राप्त अधिकारों को समझने और उनके इस्तेमाल करने की है। मैं किसी भी धर्म या जाती का पक्ष नही लेना चाहता हूँ, लेकिन कहना चाहता हूँ की अपने धर्म और जाती को मानना जितना जरुरी है उतना ही बाकी लोगो के धर्म और जाती का समान करना है। अतः धर्म और जाती के नाम पर इस बार का वोट डालने के पक्ष में मैं बिल्कुल नही हूँ, बल्कि मैं कभी भी उस के पक्ष में नही हूँ क्यूंकि यह तो पुरी तारक व्यक्तिगत विषय है की कौन किस धर्म या जाती का है। अशिक्षित लोगो में गिना जन मुझे एक गाली की तरह लगता है, इस लिए मैं यह नही चाहता हूँ की हम में से कोई भी अशिक्षित रहे। शिक्षा का सिर्फ़ अधिकार ही नही, बल्कि शिक्षा का विस्तार और शिक्षा का स्तर मेरे चुनावी मुद्दे हैं। २ या ३ रुपये किलो मिलने वाला राशन मेरा मोह नही आकर्षित कर सकते हैं, क्यूँ की इस बार का चुनावी मुद्दा यह नही है मेरा की कौन कितने रुपये किलो आनाज बेचेगा। मेरा मुद्दा है, हम में से कोई इस स्तर का गरीब हो ही क्यूँ की उसे किसी सरकार को चुनना पड़े जो उसकी गरीबी पर आनाज बांटने का दिखावा कर के हँसता हो।
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