Saturday, April 4, 2009

कहीं दीप जले कहीं दिल....

इतनी मंहगाई, और ऊपर से नौकरियों का खतरा,
इसमें कोई रसोई की गैस या गड्डी में पेट्रोल कैसे जलाये,
इसीलिए, मैंने भी यही सोचा है की दीप को जलने दो,
अमीरों के गलियारों को रौशन करने दो, अपनी तो दिल जलने से भी चल जायेगी....

भले ही सरकारी दफ्तारोके चक्कर काटते काटते,
और प्राइवेट नौकरियों के गलियों से हमारी जिंदगी अंधेरी हो जाए.....
हमारे मेहनत से दिया टैक्स और उसकी मंगाई पेट्रोल पर तो नेताओ का ही आधिकार है....
वे ही इन्हे जलाये, वे ही रोशनी पाए.......

क्या फर्क पड़ता है, हमारे पास तो जलाने के लिए दिल है ही.....
भले किसी नारी की वज़ह से, या आपसी रंजिशो की वज़ह से.....
आख़िर टूटा हुआ दिल हम और करेंगेभी क्या,.....
सो इसे ही जला जला कर हम अपना जहाँ रोशन करते रहेंगे.....

और हम जैसो की तो कमी भी नही है.......
ना चाहो तो भी हम जैसो से ही हर रोज़ सामना हो जाए.....
हम दिलजले तो हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं.....
यही मुक्कदर है की, कल भी जले थे, आज भी जल रहे हैं.....

रोक सकता कोई तो रोक लेता जलने से इनको....
पर वो भी सम्भव नही है.... यही दिल जलना चाहे तो कोई क्या करे...
दिल की आग बुझाओ, आग लगनी है तो पेट्रोल और गैस में आग लगाओ....
फ़िर साथ में सुर लगायेंगे..... कहीं दीप जले कहीं दिल....

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