कुछ ना होने का गम किसे है,
अपनी तो यहाँ कुछ भी नही है हस्ती।
कलम के दरोगा ने जो थामी है चुप्पी,
कहते हैं राम-रहीम चुनाव के नारे॥
चलती है जात-धर्म की चरखी,
बंटते हैं नोट, वोट के पहले।
क्या मांगता हूँ मैं भिखारी,
नेता हमारी आवाज़ काहे को सुन ले॥
रुक जा, आ जा, हमारे करीब तू तो,
तेरी कमी है अब जिंदगी में,
हाँ जिंदगी, यही नही है अब जिंदगी में॥
कब बन गए हम अपने ही चुने हुए के दास,
ना अपनी अपना बची, ना बची आन।
फ़िर भी हमने तेरे विरोध का राह नही चुना।
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