हमने भी इश्क के दायरे में शामिल होकर देखा,
इस दौर में एक सदमा अक्सर मिलता है,
मिलती नही वो, न उनका प्यार मिलता है, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥
छिपती छिपाती नजरो से भी बचकर उनके,
रस्ते पर एक दीवाना अक्सर मिलता है,
मिलती नही नज़रें, न रद-ऐ-अमल कभी, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥
सुर्ख आंखों से मुनाकिस लालिमा पलकों में दबाये,
जोहती भी नही मेरे दर्द-ऐ-तवास्सु़त अब तो,
इश्क-ऐ-दौर में ये सदमा अक्सर मिलता है,
कहाँ प्यार, यहाँ तो बस पत्थर मिलता है॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
No comments:
Post a Comment