Kashaq
Tuesday, September 29, 2009
मजबूरियां
....कुछ मजबूरियों का आलम देखो,
उन्हें देख कर भी मुस्करा न सके....
....और तो और अपनी दास्ताँ-ऐ-दिल,
मचले खूब, पर लवो पर छा न सके....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
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