Wednesday, July 8, 2009

यूँही कभी ....

अपने होठों की हँसी चुनने की जब बारी आई,
तो आँखों के सामने एक सपना आया,
समंदर से सैलाब बह गया जाने क्यूँ,
तुम याद आए, यूँही कभी...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥

और तो कुछ नही, तेरा चेहरा था सामने,
कुछ पलकों से चिपकी ओस की बूँदें,
और हांथो में मेहंदी लागाये,
तुम याद आए, बस याद आए...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥

जाने क्यूँ सोचा कुछ लम्हा चुरा लूँ,
इतिहास के पन्नो से तुम्हे उठा लूँ,
जिगर-बंद कर लूँ उन धडकनों को,
जब तुम याद आए, बस याद आए,
हाँ याद आए, बहुत याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥


रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

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