Kashaq
Monday, July 20, 2009
अपना - पराया
कोई ताबीर ना उलटी होती,
हमने हर ख्वाब ही उल्टा देखा,
रंजिशें अपनों की याद आएँगी,
क्या कहूँ किसको पराया देखा।
शहर की इस भीड़ में 'कैसर' हमने,
एक-एक शक्श को तनहा देखा॥
रचनाकार - 'कैसर'
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