Monday, July 13, 2009

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल...

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल.....

तू देख आज चमन में है रौशनी,
तुझे पुकारे है और यह कह रही,
अब दुनिया की बन्धनों से बाहर निकल,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

तेरा मस्तक क्यूँ है झुका हुआ,
चेहरा उदासियों से घिरा हुआ,
तोड़ के इन बन्धनों को आगे बढ़,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

तू उठा ले जो कदम तो,
आज रास्तो पर फूल बिखरेंगे,
क्यूँ करता है तू कल की फिकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

रोशन होगा तेरे कर्म से आज आज शमा
खिल उठ्येंगी बगियाँ, जाएगा तू जहाँ,
धर्म जात् को दरकिनार कर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ना सोच के तू कभी अकेला होगा,
तेरा इतिहास तुझसे कुछ नही पूछेगा,
अपने जेहन में विस्वास की चिंगारी जगाकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

No comments: