Friday, July 24, 2009

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है,
मैं भूखा सोता हूँ तो माँ भी भूखी सोती है,
एक रोटी ज्यादा मांग लूँ जो कभी मैं,
माँ कोने में आँखें भिगोती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

मेरी चारपाई की टूटी लकडी जब,
खट-खट कर मुझे जगोती है,
माँ तब हाथ में पाया थामे,
बैठे-बैठे ही सोती है....

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

सूखे खेतों में बरखा की आस में बैठे,
बछिया की भी आठ पहर होती है,
बनिए और महाजन की खरी-खोटी,
पापा के फटे जेबों पर बेअसर होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

मंडी के रस्ते में जब, बच्चे एकसाथ आते हैं,
तब स्कूल जाने को, हम भी तरस जाते हैं,
देख पापा की आंखों में लाचारी हम,
सोचते हैं अपनी, ऐसे तो गुज़र होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

बरसात की जब पहली बारिश,
छत से चू कर घर को भिगोती है,
तब माँ मुझको आँचल से ढक-कर,
बिन आंसू के ही रोती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

दीदी की शादी की कीमत, जब पंडित बताता है,
लड़की होने का ताना, दहेज़ बनकर आता है,
अपनी 'किस' भूल पर दीदी के दिल में,
देखो कितने अन्दर तक असर होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

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