गंगा, यमुना, गोमती,
सरयू, गंडक जान,
तीस्ता, कोशी, चम्बल,
सिंध, झेलम ले नाम,
रावी, कृष्णा, कावेरी,
गोदावरी और हिसाव,
सतलज, व्यास, नर्मदा,
तपती और चिनाव,
ब्रम्हपुत्र नदी सोन है,
महानदी धर-ध्यान,
बाईस नदी मशहूर है,
अन्दर हिन्दुस्तान॥
स्रोत - लोकगीत, ग्राम बेला,
जिला- भोजपुर (आरा)
Friday, October 23, 2009
Saturday, October 17, 2009
जेलखाना !!
कितनी उल्टी दुनिया,
कितना उल्टा ज़माना,
जिन्हें होना था जेलखानों में,
उनके हाथों में है जेलखाना॥
रचनाकार - 'मिश्रा'
कितना उल्टा ज़माना,
जिन्हें होना था जेलखानों में,
उनके हाथों में है जेलखाना॥
रचनाकार - 'मिश्रा'
Monday, October 12, 2009
घायल
माना की खुश हुए तुम,
और चेहरे पर तेरे कोई शिकन नही है,
पर कैसे कह सकते हो दिल में,
जुदाई का कोई चुभन नही है।
तो क्यूँ ना जग को लाख बहने दिखा,
अपने हर गम पर जोरदार ठहाके लगाओ,
छाप छोड़ गई हैं यादें जो दिल में,
उन्हें मिटाओगे कैसे तुम ही बताओ।
कह नही सकते की दिल, तुम्हारा दिल,
सिर्फ़ तुम्हारा ही कायल है,
चोट तो दोनों ही दिलों पर लगी हैं,
दोनों ही तनहा और दोनों ही घायल हैं॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
और चेहरे पर तेरे कोई शिकन नही है,
पर कैसे कह सकते हो दिल में,
जुदाई का कोई चुभन नही है।
तो क्यूँ ना जग को लाख बहने दिखा,
अपने हर गम पर जोरदार ठहाके लगाओ,
छाप छोड़ गई हैं यादें जो दिल में,
उन्हें मिटाओगे कैसे तुम ही बताओ।
कह नही सकते की दिल, तुम्हारा दिल,
सिर्फ़ तुम्हारा ही कायल है,
चोट तो दोनों ही दिलों पर लगी हैं,
दोनों ही तनहा और दोनों ही घायल हैं॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Tuesday, October 6, 2009
कौन किस गली जा रहा है...
कौन किस गली जा रहा है,
अपनी तो राह वही है,
दिशा भी वही अपनी फ़िर,
कौन यह रास्ता भटका रहा है...
तुम देखो, के मैं दीखता हूँ के नही,
मैं देखूं की तुम दिखती हो के नही,
कोई और नही है राहों में फ़िर,
फ़िर किसका प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा है...
कभी मैं खामोश हूँ,
कभी तुम खामोश हो,
ये मधुर सी ध्वनि कैसी फ़िर,
कौन ये संगीत गुनगुना रहा है...
कुछ नही है मेरे पास,
कुछ नही है तेरे पास,
दोनों ही हैं खली हाथ फ़िर,
कौन तुम्हारा हाथ थामे जा रहा है...
तुम भी चलते हो रुक-रुक कर,
हम भी चलते हैं रुक-रुक कर,
जब दोनों हैं खड़े एकसाथ फ़िर,
कौन सा कारवां चलता जा रहा है...
आगे भी कुछ नही राहों पर,
पीछे भी कुछ नही राहों पर,
राह सुनी है दोनों तरफ़ फ़िर,
क्यूँ ये राही ठोकर खा रहा है...
हम भी अपनी गली जा रहे हैं,
तुम भी अपनी गली जा रहे हो,
दोनों की गलियां अलग, मंजिल अलग फ़िर,
"कौन किस गली जा रहा है....."
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
अपनी तो राह वही है,
दिशा भी वही अपनी फ़िर,
कौन यह रास्ता भटका रहा है...
तुम देखो, के मैं दीखता हूँ के नही,
मैं देखूं की तुम दिखती हो के नही,
कोई और नही है राहों में फ़िर,
फ़िर किसका प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा है...
कभी मैं खामोश हूँ,
कभी तुम खामोश हो,
ये मधुर सी ध्वनि कैसी फ़िर,
कौन ये संगीत गुनगुना रहा है...
कुछ नही है मेरे पास,
कुछ नही है तेरे पास,
दोनों ही हैं खली हाथ फ़िर,
कौन तुम्हारा हाथ थामे जा रहा है...
तुम भी चलते हो रुक-रुक कर,
हम भी चलते हैं रुक-रुक कर,
जब दोनों हैं खड़े एकसाथ फ़िर,
कौन सा कारवां चलता जा रहा है...
आगे भी कुछ नही राहों पर,
पीछे भी कुछ नही राहों पर,
राह सुनी है दोनों तरफ़ फ़िर,
क्यूँ ये राही ठोकर खा रहा है...
हम भी अपनी गली जा रहे हैं,
तुम भी अपनी गली जा रहे हो,
दोनों की गलियां अलग, मंजिल अलग फ़िर,
"कौन किस गली जा रहा है....."
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
Saturday, October 3, 2009
मैं और मेरी तन्हाई
उदास फिज़ा आज मुझसे है कह रही,
आ चलें दूर दुनिया की नज़रों से।
चलें वहां जहाँ कोई और ना हो, बस
अपनी अकेली दुनिया, और तन्हाई...
ज़लता हुआ झूठा दीपक ना हो,
अंधेरे में बुला रही रौशनी ना हो,
रास्तो में दर्द के छींटे ना हों,
बस एक मैं और, मेरी परछाई...
वक्त का और इंतज़ार नही होता,
इन लम्हों में कुछ रूकती सी धड़कन,
फ़िर क्यूँ लगे ये दिल, चल चलें दूर,
बस एक मैं और मेरी रुसवाई...
उन मुकामों का किसे इंतज़ार,
जो तुझे तेरी मुक्कमल जहाँ न दे सकीं,
रगों में बहती ज्वलन से दूर,
बस एक मैं और मेरी तन्हाई....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
आ चलें दूर दुनिया की नज़रों से।
चलें वहां जहाँ कोई और ना हो, बस
अपनी अकेली दुनिया, और तन्हाई...
ज़लता हुआ झूठा दीपक ना हो,
अंधेरे में बुला रही रौशनी ना हो,
रास्तो में दर्द के छींटे ना हों,
बस एक मैं और, मेरी परछाई...
वक्त का और इंतज़ार नही होता,
इन लम्हों में कुछ रूकती सी धड़कन,
फ़िर क्यूँ लगे ये दिल, चल चलें दूर,
बस एक मैं और मेरी रुसवाई...
उन मुकामों का किसे इंतज़ार,
जो तुझे तेरी मुक्कमल जहाँ न दे सकीं,
रगों में बहती ज्वलन से दूर,
बस एक मैं और मेरी तन्हाई....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
एक धुंधले से चेहरे से क्या पूछता हूँ...
मुझे जिंदगी का मतलब बतायेंगी,
क्या आप मेरे कुछ और करीब आएँगी?
मैंने रास्तो पर पत्थर को लुढ़कते देखा है,
क्या आप इस पत्थर को रास्ता दिखाएंगी?
हमने आप से मुखातिर होना चाह,
कहीं खता तो नहीं की, दानिस्ता,
ग़र शान में आप की कोई गुस्ताखी हुई हो,
छमा कर दें तो बड़प्पन, वरना सजा बतायेंगी?
हम आप के उत्तर का इंतज़ार करेंगे,
आप हमें याद करने में कितना वक़्त लगाएंगी?
कहीं इतिहास में हम एक मोड़ पर तो नहीं थे,
वक़्त का दामन छोड़, क्या उसी मोड़ पर आएँगी?
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
क्या आप मेरे कुछ और करीब आएँगी?
मैंने रास्तो पर पत्थर को लुढ़कते देखा है,
क्या आप इस पत्थर को रास्ता दिखाएंगी?
हमने आप से मुखातिर होना चाह,
कहीं खता तो नहीं की, दानिस्ता,
ग़र शान में आप की कोई गुस्ताखी हुई हो,
छमा कर दें तो बड़प्पन, वरना सजा बतायेंगी?
हम आप के उत्तर का इंतज़ार करेंगे,
आप हमें याद करने में कितना वक़्त लगाएंगी?
कहीं इतिहास में हम एक मोड़ पर तो नहीं थे,
वक़्त का दामन छोड़, क्या उसी मोड़ पर आएँगी?
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
बात फूलों की...
फिर छिडी रात, बात फूलों की,
रात है या बरात फुलों की॥
फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फुलों की, रात फुलों की॥
आपका साथ - साथ फुलों का,
आपकी बात फुलों की॥
फूल खिलते रहंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फुलों की॥
नज़रें मिलती हैं, जाम मिलते हैं,
मिल रही है हयात फुलों की॥
यह महकती हुई ग़ज़ल मकदु,
जैसे सेहरा में रात फुलों की॥
फ़िल्म: बाज़ार
गीत: लता मंगेशकर एवं तलत अजीज़
रात है या बरात फुलों की॥
फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फुलों की, रात फुलों की॥
आपका साथ - साथ फुलों का,
आपकी बात फुलों की॥
फूल खिलते रहंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फुलों की॥
नज़रें मिलती हैं, जाम मिलते हैं,
मिल रही है हयात फुलों की॥
यह महकती हुई ग़ज़ल मकदु,
जैसे सेहरा में रात फुलों की॥
फ़िल्म: बाज़ार
गीत: लता मंगेशकर एवं तलत अजीज़
लता मंगेशकर
"संगीत है स्वर इश्वर की,
सुर-साधना में है माँ शारदा का नाम,
रागी जो सुनाये रागिनी,
तो रोगी को मिले आराम॥"
-- लता मंगेशकर को समर्पित।
सौजन्य- अखिल भारतीय रेडियो (बोल: 'श्री अमिन सायनी')
सुर-साधना में है माँ शारदा का नाम,
रागी जो सुनाये रागिनी,
तो रोगी को मिले आराम॥"
-- लता मंगेशकर को समर्पित।
सौजन्य- अखिल भारतीय रेडियो (बोल: 'श्री अमिन सायनी')
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