Saturday, October 3, 2009

एक धुंधले से चेहरे से क्या पूछता हूँ...

मुझे जिंदगी का मतलब बतायेंगी,
क्या आप मेरे कुछ और करीब आएँगी?

मैंने रास्तो पर पत्थर को लुढ़कते देखा है,
क्या आप इस पत्थर को रास्ता दिखाएंगी?

हमने आप से मुखातिर होना चाह,
कहीं खता तो नहीं की, दानिस्ता,
ग़र शान में आप की कोई गुस्ताखी हुई हो,
छमा कर दें तो बड़प्पन, वरना सजा बतायेंगी?

हम आप के उत्तर का इंतज़ार करेंगे,
आप हमें याद करने में कितना वक़्त लगाएंगी?
कहीं इतिहास में हम एक मोड़ पर तो नहीं थे,
वक़्त का दामन छोड़, क्या उसी मोड़ पर आएँगी?

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।

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