Tuesday, October 6, 2009

कौन किस गली जा रहा है...

कौन किस गली जा रहा है,
अपनी तो राह वही है,
दिशा भी वही अपनी फ़िर,
कौन यह रास्ता भटका रहा है...

तुम देखो, के मैं दीखता हूँ के नही,
मैं देखूं की तुम दिखती हो के नही,
कोई और नही है राहों में फ़िर,
फ़िर किसका प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा है...

कभी मैं खामोश हूँ,
कभी तुम खामोश हो,
ये मधुर सी ध्वनि कैसी फ़िर,
कौन ये संगीत गुनगुना रहा है...

कुछ नही है मेरे पास,
कुछ नही है तेरे पास,
दोनों ही हैं खली हाथ फ़िर,
कौन तुम्हारा हाथ थामे जा रहा है...

तुम भी चलते हो रुक-रुक कर,
हम भी चलते हैं रुक-रुक कर,
जब दोनों हैं खड़े एकसाथ फ़िर,
कौन सा कारवां चलता जा रहा है...

आगे भी कुछ नही राहों पर,
पीछे भी कुछ नही राहों पर,
राह सुनी है दोनों तरफ़ फ़िर,
क्यूँ ये राही ठोकर खा रहा है...

हम भी अपनी गली जा रहे हैं,
तुम भी अपनी गली जा रहे हो,
दोनों की गलियां अलग, मंजिल अलग फ़िर,
"कौन किस गली जा रहा है....."


रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।

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