उदास फिज़ा आज मुझसे है कह रही,
आ चलें दूर दुनिया की नज़रों से।
चलें वहां जहाँ कोई और ना हो, बस
अपनी अकेली दुनिया, और तन्हाई...
ज़लता हुआ झूठा दीपक ना हो,
अंधेरे में बुला रही रौशनी ना हो,
रास्तो में दर्द के छींटे ना हों,
बस एक मैं और, मेरी परछाई...
वक्त का और इंतज़ार नही होता,
इन लम्हों में कुछ रूकती सी धड़कन,
फ़िर क्यूँ लगे ये दिल, चल चलें दूर,
बस एक मैं और मेरी रुसवाई...
उन मुकामों का किसे इंतज़ार,
जो तुझे तेरी मुक्कमल जहाँ न दे सकीं,
रगों में बहती ज्वलन से दूर,
बस एक मैं और मेरी तन्हाई....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
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