हे पार्थ उठो, अब बहुत हुआ,
चलो कि शत्रु ललकार रहा है,
रणभेरियाँ बज उठी अब,
जन-मानस तुम्हे पुकार रहा है।
कुरुक्षेत्र बन रहा है भारत,
निकलो महाभारत की कहानी से,
आज कौरव आए पानी से, देखो।
टूट न जाए गांडीव ग्लानी से।
चलो मैत्री बहुत हुई अब,
अब हो जाए, विजयी कलकारे।
देव-दूत, शान्ति-दूत, सब हारे,
अब बस पुरुषार्थ है फ़ुफ़्कारे।
अपने शस्त्रों पर प्रत्यंचा चढा दो,
कौरवो के अंत का बिगुल बजा दो।
गरुड़, हंस, ब्रह्मोस, सूर्य और पृथ्वी,
क्रोध की अग्नि, नापाक जमीं पर बरसा दो।
राजनीती, कूटनीति, सब नाकारी,
अब बस ध्वस्त करने की बारी।
कर्म को कुकर्म पर विजय दिला दो,
कौरवो पर अपनी ध्वजा लहर दो।
द्रोण, पितामह कोई गैर नही हैं,
हमारा भी उनसे बैर नही है।
पर अपने घर के शकुनी को पहचानो।
रिश्ते त्यागो, शत्रु पर निशाना तानो।
हे भारत के पार्थ उठो अब,
द्वेष, कलुष, मतभेद मिटा दो।
दक्षिण से कश्मीर लहुलुहान है,
जख्मो पर विजय का लेप लगा दो॥
रचनाकार - सुमित्र कुमार (फौजी)।
चलो कि शत्रु ललकार रहा है,
रणभेरियाँ बज उठी अब,
जन-मानस तुम्हे पुकार रहा है।
कुरुक्षेत्र बन रहा है भारत,
निकलो महाभारत की कहानी से,
आज कौरव आए पानी से, देखो।
टूट न जाए गांडीव ग्लानी से।
चलो मैत्री बहुत हुई अब,
अब हो जाए, विजयी कलकारे।
देव-दूत, शान्ति-दूत, सब हारे,
अब बस पुरुषार्थ है फ़ुफ़्कारे।
अपने शस्त्रों पर प्रत्यंचा चढा दो,
कौरवो के अंत का बिगुल बजा दो।
गरुड़, हंस, ब्रह्मोस, सूर्य और पृथ्वी,
क्रोध की अग्नि, नापाक जमीं पर बरसा दो।
राजनीती, कूटनीति, सब नाकारी,
अब बस ध्वस्त करने की बारी।
कर्म को कुकर्म पर विजय दिला दो,
कौरवो पर अपनी ध्वजा लहर दो।
द्रोण, पितामह कोई गैर नही हैं,
हमारा भी उनसे बैर नही है।
पर अपने घर के शकुनी को पहचानो।
रिश्ते त्यागो, शत्रु पर निशाना तानो।
हे भारत के पार्थ उठो अब,
द्वेष, कलुष, मतभेद मिटा दो।
दक्षिण से कश्मीर लहुलुहान है,
जख्मो पर विजय का लेप लगा दो॥
रचनाकार - सुमित्र कुमार (फौजी)।
1 comment:
nicely weaved and good base to write a poem...thoughts are sound and profound.....
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