Saturday, December 6, 2008

आहिस्ता आहिस्ता.....

तुमने ना देखा की चिराग बुझता गया,
तनहाई में तुमसे जुदाई का गम बढ़ता गया,
फ़िर बारिश की बूंदों ने यूँ याद किया हमें,
कोई सुलगता एहसास जैसे, आहिस्ता आहिस्ता।

खोये को याद करके सहमता रहा,
मिलने की चाह में तड़पता रहा,
जैसे नज़रों से दूर होती जिंदगी,
एक ओर झुकता यौवन, आहिस्ता आहिस्ता।

आज लाल गुलाब की पंखुडियों का खिलना,
हमारे वजूद के मिटने का इशारा करती हैं,
वक्त पर हम ही न समझ पाए दिल्लगी का आलम,
बेवाफई की कहानी सुनाऊ, आहिस्ता आहिस्ता।

दुनिया का दस्तूर ही है भुला देना,
तू भी मुझे, मेरी याद को भुला देना ए नूर-ऐ-जहाँ,
हम भी तुम्हे पाने की ख्वाइश मिटा देंगे,
आज हसकर मगर, आहिस्ता आहिस्ता॥


यह रचना नीरज की रचना 'तुम याद आए' के जबाब में मैंने लिखी थी .............

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

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