आशियाने कब के हैं, उजड़ चुके,
अरमान कब के हैं, बहल चुके,
अब तो बस धडकनों का लिहाज़ है,
वरना हम तो कब के हैं, मर चुके।
कभी इस दिल में भी,
ख्वाबों की लौ रोशन रहती थी।
आंखों में सपने, और रगों में,
उमंगो की लहर रहती थी।
ना जाने ये कैसा मुकाम आया,
कि, उदासी फिजा में है, घुल चुकी,
और उजाले अंधेरे में हैं,
गुम हो चुके।
अब तो बस धडकनों का लिहाज़ है,
वरना हम तो कब के हैं मर चुके॥
रचनाकार - "अज्ञात" ।
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