Wednesday, December 24, 2008

आ शाकी मुझसे मिल....

दर्द मेरा देख शाकी,
आ मेरे करीब आ।
रूह को न रख पीछे,
तन को ना आगे ला॥

मन् मेरा उदास था,
और उदासी ना बढ़ा।
मिलना है तो मुझसे मिल,
मेरी हँसी ना उड़ा॥

मैं भी नही, जो तू नही,
तू भी मेरे बिन पूरी नही।
भावनाओ को खिलने दे,
किसी को बीच में न बुला॥

पिघलते अश्क क्यूँ सुखाता है,
जज्बातों को यूँ ना तरसा।
आ शाकी मुझसे मिल,
आ मेरे करीब आ॥

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Tuesday, December 23, 2008

एक शेर अर्ज़ है...

आशियाने कब के हैं, उजड़ चुके,
अरमान कब के हैं, बहल चुके,
अब तो बस धडकनों का लिहाज़ है,
वरना हम तो कब के हैं, मर चुके।

कभी इस दिल में भी,
ख्वाबों की लौ रोशन रहती थी।
आंखों में सपने, और रगों में,
उमंगो की लहर रहती थी।

ना जाने ये कैसा मुकाम आया,
कि, उदासी फिजा में है, घुल चुकी,
और उजाले अंधेरे में हैं,
गुम हो चुके।

अब तो बस धडकनों का लिहाज़ है,
वरना हम तो कब के हैं मर चुके॥

रचनाकार - "अज्ञात" ।

दिल....

दिल के अन्दर जो कुछ भी है,
लव्जों में कब ढलता है।
दर्द लावो तक आते आते,
अपनी शक्ल बदलता है।।

यूँ तो जो आँखें खोलकर चलते हैं,
वो भी ठोकर खाकर गिरते हैं।
एक तेरा दीवाना ऐसा है,
ठोकर खाकर संभालता है।।

बादल बरसें या छंट जायें,
इनसे मुझको क्या लेना है।
दिल की हालत ऐसी है कि,
हर मौसम ही खलता है।।

बदल गया हर वक्त फ़िर भी,
दिल तुझसे ही बहलता है।
पत्थर तो पत्थर है, आख़िर,
न जलता है, न पिघलता है॥

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Saturday, December 13, 2008

थोड़ा रुकता हूँ, थोड़ा चलता हूँ.....

उन रास्तो पर पत्थर बहुत हैं,
जिनपर मैं संभालता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कभी अपनी बेखुदी का हश्र न सोचा,
अपने ही दिल की आग में जलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कोई मुझसा न होगा किस्मतवाला,
अब किसी किस्मत से नही डरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

क्या हूँ उनका, कौन हूँ मैं,
क्यूँ उनके आंसुओं से डरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

मैं कोई बर्फ का टुकड़ा तो नही,
फ़िर क्यूँ उनके पास आकर पिघलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

मेरे रस्ते के हमसफ़र सिर्फ़ वो हीं तो नही,
फ़िर उनके ही रास्तों से क्यूँ गुज़रता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

आज फ़िर मेरे रस्ते में एक पत्थर आया,
अब सिर्फ़ पत्थरों के बीच से गुज़रता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

क्यूँ देखता होगा, मुझे कोई आख़िर,
मैं कोई हीरा नही जो चमकता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

क्या पाया हमने उनको पाकर,
उनको खोने से इतना क्यूँ डरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कैसा पागल हूँ, दीवाना हूँ,
उनको सोचकर ही मचलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कितना मासूम हूँ कैसे कहूं,
उन्ही की बातों से बहलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

मैं कहीं वक्त का पर्याय तो नही,
क्यूँ अपने ही वजूद को तरसता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

अपने हंसने के दिन तो अब आते ही नही,
उनकी हँसी पर अब आए दिन हँसता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

चंद लम्हों की बात और होती है,
हर साँस में जीता और मरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

अपनी राह का मुसाफिर मैं अकेला तो नही,
फ़िर सुनी गलियों से क्यूँ गुज़रता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

यही सच है, मैं अकेला हूँ,
कभी चलता हूँ, कभी ठहरता हूँ।
सुनी राहों का वारिश हूँ,
क्या रुकता हूँ, क्या चलता हूँ॥

हर मोड़ पर किसको खोजता हूँ,
कभी आगे, कभी पीछे मुड़ता हूँ।
किसको देखकर थोड़ा रुकता हूँ,
किसको देखकर मैं चलता हूँ॥

सुनी राहों का वारिश हूँ मैं,
क्या रुकता हूँ, क्या चलता हूँ!!

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Thursday, December 11, 2008

गुजरने को....

और एक रात है गुजरने को,
छोटी सी मुलाकात है गुजरने को।
मौसम तो गर्मी का है आज, मगर,
आंखों में बरसात है, गुजरने को।

तुम्हे याद बहुत आऊंगा,
सच कहता हूँ, भूल न पाउँगा।
ये अपनी अपनी दिल की बात है,
वक्त से मजबूर होकर, हालात है गुजरने को।

जाना तो इस कदर न, कि फ़िर लौट कर ना आना,
तुम्हारे बिन ये दिल नही करता, सँवरने को।
कुछ लम्हे बचे हैं, जी लेते हैं हम सोचकर,
आज की रात, आखिरी रात है, गुजरने को।

तेरे लौट के आने तक, तेरे जाने के बाद,
कल की शाम तुझ संग बिताने के बाद,
क्यूँ ऐसा लगता है मुझको अक्सर,
बड़ी लम्बी हर रात है, गुजरने को॥


रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Saturday, December 6, 2008

आहिस्ता आहिस्ता.....

तुमने ना देखा की चिराग बुझता गया,
तनहाई में तुमसे जुदाई का गम बढ़ता गया,
फ़िर बारिश की बूंदों ने यूँ याद किया हमें,
कोई सुलगता एहसास जैसे, आहिस्ता आहिस्ता।

खोये को याद करके सहमता रहा,
मिलने की चाह में तड़पता रहा,
जैसे नज़रों से दूर होती जिंदगी,
एक ओर झुकता यौवन, आहिस्ता आहिस्ता।

आज लाल गुलाब की पंखुडियों का खिलना,
हमारे वजूद के मिटने का इशारा करती हैं,
वक्त पर हम ही न समझ पाए दिल्लगी का आलम,
बेवाफई की कहानी सुनाऊ, आहिस्ता आहिस्ता।

दुनिया का दस्तूर ही है भुला देना,
तू भी मुझे, मेरी याद को भुला देना ए नूर-ऐ-जहाँ,
हम भी तुम्हे पाने की ख्वाइश मिटा देंगे,
आज हसकर मगर, आहिस्ता आहिस्ता॥


यह रचना नीरज की रचना 'तुम याद आए' के जबाब में मैंने लिखी थी .............

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Thursday, December 4, 2008

हे भारत के पार्थ उठो अब

हे पार्थ उठो, अब बहुत हुआ,
चलो कि शत्रु ललकार रहा है,
रणभेरियाँ बज उठी अब,
जन-मानस तुम्हे पुकार रहा है।

कुरुक्षेत्र बन रहा है भारत,
निकलो महाभारत की कहानी से,
आज कौरव आए पानी से, देखो।
टूट न जाए गांडीव ग्लानी से।

चलो मैत्री बहुत हुई अब,
अब हो जाए, विजयी कलकारे।
देव-दूत, शान्ति-दूत, सब हारे,
अब बस पुरुषार्थ है फ़ुफ़्कारे।

अपने शस्त्रों पर प्रत्यंचा चढा दो,
कौरवो के अंत का बिगुल बजा दो।
गरुड़, हंस, ब्रह्मोस, सूर्य और पृथ्वी,
क्रोध की अग्नि, नापाक जमीं पर बरसा दो।

राजनीती, कूटनीति, सब नाकारी,
अब बस ध्वस्त करने की बारी।
कर्म को कुकर्म पर विजय दिला दो,
कौरवो पर अपनी ध्वजा लहर दो।

द्रोण, पितामह कोई गैर नही हैं,
हमारा भी उनसे बैर नही है।
पर अपने घर के शकुनी को पहचानो।
रिश्ते त्यागो, शत्रु पर निशाना तानो।

हे भारत के पार्थ उठो अब,
द्वेष, कलुष, मतभेद मिटा दो।
दक्षिण से कश्मीर लहुलुहान है,
जख्मो पर विजय का लेप लगा दो॥


रचनाकार - सुमित्र कुमार (फौजी)।

Wednesday, December 3, 2008

चित्रकला प्रदर्शनी

अचानक ही हमारे शहर में,
चित्रकला की एक प्रदर्शनी लगी।
औरो की भांति हममें भी,
देखने की अभिलाषा जगी।

निकल पड़े कदम राहों पर,
लिए उत्सुकता मन की निगाहों पर,
जगी लालसा और अंकुर फूटे,
उतेजना जगी अपनी चाहो पर।

भीतर जाकर फ़िर हमने देखा,
नारी तन पर कोमलता की रेखा।

नख इतने श्रृंगार भरे थे,
मनो उनमें सितार जड़े थे।

कर मेहंदी कर कृष्ण कड़ा,
चूडियों का रंग मोहक था बड़ा।

हिरनों के मनमोहक चछु के,
छींटे पलकों पर दीखते थे,
मानो परियां मदहोशी में थिरकना,
इन्ही पलकों पर सीखते थे।

लवो का खुलना, और सिकुड़ना,
फ़िर होठो का यूँ कुतराना,
बिन बोले हर अदा जताए,
ना हो, हाँ हो, या हो शर्माना।

पतली कमर, गोरा सा उदर,
वक्ष पर था कइयो का मिट जाना,
लिए तन पर यौवन का जोश,
हर अंग था दक्ष कला का नजराना।

खुरापाती मन मेरा मचला,
हाथ तस्वीर के वक्ष पर उछला,

अचानक ही सन्नाटा सा था छा गया,
लगा, भूचाल सा था आ गया।
मुझपर जैसे वज्रावार पड़ा था,
मैं लाचार सा घुटनों पर खड़ा था।

सर उठाके ज्यूँ मैंने देखा,
कल्पना के चादर को उतार फेंका।

सामने कोई तस्वीर नही,
मेरे जीवन की तकदीर पड़ी थी,
फ्रेम तो पूरा खाली था,
फ्रेम के पीछे मेरी बीबी खड़ी थी।

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

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*******कृपया इसे सिर्फ़ हास्य के रूप में लें*******

Sunday, November 30, 2008

तुम याद आए...

कल, इस बारिश में,
जब भींगे तनहा अकेले।
तुम याद आए....
बस याद आए....

कठौती में जमा हर बूँद
मेरी बेरुखी की दास्ताँ है।
बाकी बिखरे हुए कहते हैं, कितना.....
मुझे तुम याद आए.......

पानी में धुलती हरी हरी घास,
मिट्टी के गलियारे... और धुलती मिट्टी....
तेरे कदमो के निसान ढूंढेंगे।
तुम उन्हें भी कितना याद आए......

बारिश अब रुक चुकी है.....
सबकुछ कितना पवित्र और साफ़ है....
हरे हरे पत्ते .... हरे हरे रास्ते .....
सबकुछ कितना नया है......
बारिश की वो आखरी बूँद....
जो उस गुलाब से लिपटी हुई है....
जिसे इंतज़ार है..... तेरे लवो का जो...
हमेशा की तरह.....
आकर उन्हें चूमेंगे ..... और यह लाल गुलाब.....
शर्मा के गुलाबी हो जाएगा......

रचनाकार - नीरज पाठक।

कुछ सवाल अपने वजूद से

दाग लगा जो दामन में
फ़िर उसे मिटाना क्या....
सब जानते हैं हम बुजदिल हैं तो,
वजूद अपना जताना क्या...
एहसास तो तुमको भी होगा दोस्त,
मेरे कसूर का,
तुम मानते ही नही,
तो तुम्हे बताना क्या....

आज फ़िर मैं,
खयालो में गुम हूँ,
जब से हूँ, अकेला हूँ,
अकेलेपन से घबराना क्या....
दुश्मन हूँ और,
कायर भी हूँ...
फ़िर मरना क्या,
और मिटाना क्या....

तेरे द्वार पर हम अपना,
दिल छोड़ जायेंगे,
बिन तेरे जिसकी,
धड़कन क्या, धडकाना क्या....
उलझ जाए मेरी परछाई,
तेरे साए में...
फ़िर जिस्मो का
लिपटना क्या, और सिमटना क्या...

जब दौड़ ही चुके हैं,
बुढापे की दौड़...
तो चेहरे की
झुर्रियों से शर्माना क्या....
अपने राहो की
मंजिल आज कोई नही,
फ़िर युहीं रुकना क्या,
और चले जाना क्या......

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

गीत वही गाता हूँ....

कुछ अर्ज़ किया है,
कुछ दुखडा सुनाता हूँ....
आज रात नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....

तुम्हारे चेहरे पर कसक सी देखि,
चाहा तुम्हे मर्ज़ की दावा दिलाता हूँ.....
आज नए राह पर खड़ा हूँ....
पर गीत वही गाता हूँ......

चाहा था तुमको भी चाँद से देखूं,
हकीकत नही, सपनो की बात बताता हूँ....
आज हालात् नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....

कभी अपनी उमर तुम्हे दे दूँ...
कभी तेरी वफाई के राग सुनाता हूँ.....
आज बात नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....

मेरा मुक्कदर किस ने लिखा...
तुम्हे अपना मुक्कदर सुनाता हूँ...
आज मंजिल नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Saturday, November 29, 2008

मेरी पहली कविता - गोधरा कांड

संदार्व : गोधरा में दंगाइयों के कुकर्म के पाश्चात्य एक बालक की दास्ताँ

देखा, ना देखा,
देखा ना गया,
वर्तमान की सीढ़ी ऊपर
उठकर आगे देखा ना गया...

मरी माँ नही ममता पड़ी थी,
तन जिसका कुचला था,
याद आया मैं नग्न,
उसके आँचल में उछाला था...

आब्बा नही पितृत्व था वो,
परवान चढा आस्तित्व जिसका,
समझ ना सका मैं हित किसका,
अहित किसका और निहित किसका...

सिद्ध किए थे श्रेष्ठता धारो की,
तलवारों वारो और हथियारों की,
याद आया इस परिस्थिति में,
अहमियत त्याहारो की,
होली दिवाली इद्द मुहर्रम
और बाटी खुशियाँ यारो की....

ज्यों देखा फाटक से बाहर आकर,
थमी साँसें वहां अपनों को पाकर,
गला रुंध गया था मेरा,
विरहां के मारो को खाकर....

अंग प्रत्यंग यूँ बिखरे पड़े थे,
मनो सुर असुर अमृत को लड़ये थे,
देख दृश्य हृदये यूँ डोला, बोला,
असुरत्व मानवता पर भरी पड़े थे...

रोया खोया मैं ऊपर देखा,
पतझड़ में खोझा बहार,
शांत लहू की धारा से भरे,
बर्तन ले लेते थे उभार....

अपरिचित सी इस अंजुमन में,
मैं चीत्कार रहा था बारम्बार,
कोई तो पुचकारे मुझको भी,
बाहों में ले और दे अपनों का प्यार....

सोच रहा था क्या हुआ यह सब,
क्यूँ हुआ, कोई तो समझा दे,
रक्त एक और वक्त भी एक,
फ़िर मजहब अलग क्यूँ, कोई तो बतला दे.....

हे इश्वर क्या ऐसा है की,
अब भी हम में मानवता कम है,
मेरी आँखें तो पथरा गई हैं,
क्या तेरी आंखों में पानी कम है....

कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है....
बचपन को कन्धा दे आया,
अब बारी ए यौवन तेरा है.....

कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है.....
हे इश्वर तेरी सर्वश्रेस्ट कृति,
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है......

रचनाकार - आनंद मिश्रा।