अचानक ही हमारे शहर में,
चित्रकला की एक प्रदर्शनी लगी।
औरो की भांति हममें भी,
देखने की अभिलाषा जगी।
निकल पड़े कदम राहों पर,
लिए उत्सुकता मन की निगाहों पर,
जगी लालसा और अंकुर फूटे,
उतेजना जगी अपनी चाहो पर।
भीतर जाकर फ़िर हमने देखा,
नारी तन पर कोमलता की रेखा।
नख इतने श्रृंगार भरे थे,
मनो उनमें सितार जड़े थे।
कर मेहंदी कर कृष्ण कड़ा,
चूडियों का रंग मोहक था बड़ा।
हिरनों के मनमोहक चछु के,
छींटे पलकों पर दीखते थे,
मानो परियां मदहोशी में थिरकना,
इन्ही पलकों पर सीखते थे।
लवो का खुलना, और सिकुड़ना,
फ़िर होठो का यूँ कुतराना,
बिन बोले हर अदा जताए,
ना हो, हाँ हो, या हो शर्माना।
पतली कमर, गोरा सा उदर,
वक्ष पर था कइयो का मिट जाना,
लिए तन पर यौवन का जोश,
हर अंग था दक्ष कला का नजराना।
खुरापाती मन मेरा मचला,
हाथ तस्वीर के वक्ष पर उछला,
अचानक ही सन्नाटा सा था छा गया,
लगा, भूचाल सा था आ गया।
मुझपर जैसे वज्रावार पड़ा था,
मैं लाचार सा घुटनों पर खड़ा था।
सर उठाके ज्यूँ मैंने देखा,
कल्पना के चादर को उतार फेंका।
सामने कोई तस्वीर नही,
मेरे जीवन की तकदीर पड़ी थी,
फ्रेम तो पूरा खाली था,
फ्रेम के पीछे मेरी बीबी खड़ी थी।
रचनाकार - आनंद मिश्रा।
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*******कृपया इसे सिर्फ़ हास्य के रूप में लें*******
5 comments:
Ultimate
बहुत अच्छी हास्य कविता
हिन्दी लिखाड़ियों की दुनिया में आपका हार्दिक स्वागत है, खूब लिखें नाम कमायें । हार्दिक शुभकामनायें
अच्छी चित्रकला है . :-)
हिन्दी चिठ्ठा विश्व में स्वागत है
टेम्पलेट अच्छा चुना है
कृपया वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दें
कृपया मेरा भी ब्लाग देखे और टिप्पणी दे
http://www.ucohindi.co.nr
हा,,,,हा,,,,,हा,,,हा
कल्पना हमेशा प्यारी होती है वास्तविकता से
अच्छी हास्य कविता है !
मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !!!
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है !
Hindi and urdu words ka mixup hai ..
to make it more better, better stick with hindi words only ..
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