तो क्या ग़म है,
की हमारी आँखें नम हैं,
यह तो खुशी के आंसू हैं,
जो आपकी आंखों में कम हैं॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
Thursday, November 19, 2009
Friday, October 23, 2009
भारत की प्रमुख नदियाँ!
गंगा, यमुना, गोमती,
सरयू, गंडक जान,
तीस्ता, कोशी, चम्बल,
सिंध, झेलम ले नाम,
रावी, कृष्णा, कावेरी,
गोदावरी और हिसाव,
सतलज, व्यास, नर्मदा,
तपती और चिनाव,
ब्रम्हपुत्र नदी सोन है,
महानदी धर-ध्यान,
बाईस नदी मशहूर है,
अन्दर हिन्दुस्तान॥
स्रोत - लोकगीत, ग्राम बेला,
जिला- भोजपुर (आरा)
सरयू, गंडक जान,
तीस्ता, कोशी, चम्बल,
सिंध, झेलम ले नाम,
रावी, कृष्णा, कावेरी,
गोदावरी और हिसाव,
सतलज, व्यास, नर्मदा,
तपती और चिनाव,
ब्रम्हपुत्र नदी सोन है,
महानदी धर-ध्यान,
बाईस नदी मशहूर है,
अन्दर हिन्दुस्तान॥
स्रोत - लोकगीत, ग्राम बेला,
जिला- भोजपुर (आरा)
Saturday, October 17, 2009
जेलखाना !!
कितनी उल्टी दुनिया,
कितना उल्टा ज़माना,
जिन्हें होना था जेलखानों में,
उनके हाथों में है जेलखाना॥
रचनाकार - 'मिश्रा'
कितना उल्टा ज़माना,
जिन्हें होना था जेलखानों में,
उनके हाथों में है जेलखाना॥
रचनाकार - 'मिश्रा'
Monday, October 12, 2009
घायल
माना की खुश हुए तुम,
और चेहरे पर तेरे कोई शिकन नही है,
पर कैसे कह सकते हो दिल में,
जुदाई का कोई चुभन नही है।
तो क्यूँ ना जग को लाख बहने दिखा,
अपने हर गम पर जोरदार ठहाके लगाओ,
छाप छोड़ गई हैं यादें जो दिल में,
उन्हें मिटाओगे कैसे तुम ही बताओ।
कह नही सकते की दिल, तुम्हारा दिल,
सिर्फ़ तुम्हारा ही कायल है,
चोट तो दोनों ही दिलों पर लगी हैं,
दोनों ही तनहा और दोनों ही घायल हैं॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
और चेहरे पर तेरे कोई शिकन नही है,
पर कैसे कह सकते हो दिल में,
जुदाई का कोई चुभन नही है।
तो क्यूँ ना जग को लाख बहने दिखा,
अपने हर गम पर जोरदार ठहाके लगाओ,
छाप छोड़ गई हैं यादें जो दिल में,
उन्हें मिटाओगे कैसे तुम ही बताओ।
कह नही सकते की दिल, तुम्हारा दिल,
सिर्फ़ तुम्हारा ही कायल है,
चोट तो दोनों ही दिलों पर लगी हैं,
दोनों ही तनहा और दोनों ही घायल हैं॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Tuesday, October 6, 2009
कौन किस गली जा रहा है...
कौन किस गली जा रहा है,
अपनी तो राह वही है,
दिशा भी वही अपनी फ़िर,
कौन यह रास्ता भटका रहा है...
तुम देखो, के मैं दीखता हूँ के नही,
मैं देखूं की तुम दिखती हो के नही,
कोई और नही है राहों में फ़िर,
फ़िर किसका प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा है...
कभी मैं खामोश हूँ,
कभी तुम खामोश हो,
ये मधुर सी ध्वनि कैसी फ़िर,
कौन ये संगीत गुनगुना रहा है...
कुछ नही है मेरे पास,
कुछ नही है तेरे पास,
दोनों ही हैं खली हाथ फ़िर,
कौन तुम्हारा हाथ थामे जा रहा है...
तुम भी चलते हो रुक-रुक कर,
हम भी चलते हैं रुक-रुक कर,
जब दोनों हैं खड़े एकसाथ फ़िर,
कौन सा कारवां चलता जा रहा है...
आगे भी कुछ नही राहों पर,
पीछे भी कुछ नही राहों पर,
राह सुनी है दोनों तरफ़ फ़िर,
क्यूँ ये राही ठोकर खा रहा है...
हम भी अपनी गली जा रहे हैं,
तुम भी अपनी गली जा रहे हो,
दोनों की गलियां अलग, मंजिल अलग फ़िर,
"कौन किस गली जा रहा है....."
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
अपनी तो राह वही है,
दिशा भी वही अपनी फ़िर,
कौन यह रास्ता भटका रहा है...
तुम देखो, के मैं दीखता हूँ के नही,
मैं देखूं की तुम दिखती हो के नही,
कोई और नही है राहों में फ़िर,
फ़िर किसका प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा है...
कभी मैं खामोश हूँ,
कभी तुम खामोश हो,
ये मधुर सी ध्वनि कैसी फ़िर,
कौन ये संगीत गुनगुना रहा है...
कुछ नही है मेरे पास,
कुछ नही है तेरे पास,
दोनों ही हैं खली हाथ फ़िर,
कौन तुम्हारा हाथ थामे जा रहा है...
तुम भी चलते हो रुक-रुक कर,
हम भी चलते हैं रुक-रुक कर,
जब दोनों हैं खड़े एकसाथ फ़िर,
कौन सा कारवां चलता जा रहा है...
आगे भी कुछ नही राहों पर,
पीछे भी कुछ नही राहों पर,
राह सुनी है दोनों तरफ़ फ़िर,
क्यूँ ये राही ठोकर खा रहा है...
हम भी अपनी गली जा रहे हैं,
तुम भी अपनी गली जा रहे हो,
दोनों की गलियां अलग, मंजिल अलग फ़िर,
"कौन किस गली जा रहा है....."
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
Saturday, October 3, 2009
मैं और मेरी तन्हाई
उदास फिज़ा आज मुझसे है कह रही,
आ चलें दूर दुनिया की नज़रों से।
चलें वहां जहाँ कोई और ना हो, बस
अपनी अकेली दुनिया, और तन्हाई...
ज़लता हुआ झूठा दीपक ना हो,
अंधेरे में बुला रही रौशनी ना हो,
रास्तो में दर्द के छींटे ना हों,
बस एक मैं और, मेरी परछाई...
वक्त का और इंतज़ार नही होता,
इन लम्हों में कुछ रूकती सी धड़कन,
फ़िर क्यूँ लगे ये दिल, चल चलें दूर,
बस एक मैं और मेरी रुसवाई...
उन मुकामों का किसे इंतज़ार,
जो तुझे तेरी मुक्कमल जहाँ न दे सकीं,
रगों में बहती ज्वलन से दूर,
बस एक मैं और मेरी तन्हाई....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
आ चलें दूर दुनिया की नज़रों से।
चलें वहां जहाँ कोई और ना हो, बस
अपनी अकेली दुनिया, और तन्हाई...
ज़लता हुआ झूठा दीपक ना हो,
अंधेरे में बुला रही रौशनी ना हो,
रास्तो में दर्द के छींटे ना हों,
बस एक मैं और, मेरी परछाई...
वक्त का और इंतज़ार नही होता,
इन लम्हों में कुछ रूकती सी धड़कन,
फ़िर क्यूँ लगे ये दिल, चल चलें दूर,
बस एक मैं और मेरी रुसवाई...
उन मुकामों का किसे इंतज़ार,
जो तुझे तेरी मुक्कमल जहाँ न दे सकीं,
रगों में बहती ज्वलन से दूर,
बस एक मैं और मेरी तन्हाई....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
एक धुंधले से चेहरे से क्या पूछता हूँ...
मुझे जिंदगी का मतलब बतायेंगी,
क्या आप मेरे कुछ और करीब आएँगी?
मैंने रास्तो पर पत्थर को लुढ़कते देखा है,
क्या आप इस पत्थर को रास्ता दिखाएंगी?
हमने आप से मुखातिर होना चाह,
कहीं खता तो नहीं की, दानिस्ता,
ग़र शान में आप की कोई गुस्ताखी हुई हो,
छमा कर दें तो बड़प्पन, वरना सजा बतायेंगी?
हम आप के उत्तर का इंतज़ार करेंगे,
आप हमें याद करने में कितना वक़्त लगाएंगी?
कहीं इतिहास में हम एक मोड़ पर तो नहीं थे,
वक़्त का दामन छोड़, क्या उसी मोड़ पर आएँगी?
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
क्या आप मेरे कुछ और करीब आएँगी?
मैंने रास्तो पर पत्थर को लुढ़कते देखा है,
क्या आप इस पत्थर को रास्ता दिखाएंगी?
हमने आप से मुखातिर होना चाह,
कहीं खता तो नहीं की, दानिस्ता,
ग़र शान में आप की कोई गुस्ताखी हुई हो,
छमा कर दें तो बड़प्पन, वरना सजा बतायेंगी?
हम आप के उत्तर का इंतज़ार करेंगे,
आप हमें याद करने में कितना वक़्त लगाएंगी?
कहीं इतिहास में हम एक मोड़ पर तो नहीं थे,
वक़्त का दामन छोड़, क्या उसी मोड़ पर आएँगी?
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।
बात फूलों की...
फिर छिडी रात, बात फूलों की,
रात है या बरात फुलों की॥
फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फुलों की, रात फुलों की॥
आपका साथ - साथ फुलों का,
आपकी बात फुलों की॥
फूल खिलते रहंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फुलों की॥
नज़रें मिलती हैं, जाम मिलते हैं,
मिल रही है हयात फुलों की॥
यह महकती हुई ग़ज़ल मकदु,
जैसे सेहरा में रात फुलों की॥
फ़िल्म: बाज़ार
गीत: लता मंगेशकर एवं तलत अजीज़
रात है या बरात फुलों की॥
फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फुलों की, रात फुलों की॥
आपका साथ - साथ फुलों का,
आपकी बात फुलों की॥
फूल खिलते रहंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फुलों की॥
नज़रें मिलती हैं, जाम मिलते हैं,
मिल रही है हयात फुलों की॥
यह महकती हुई ग़ज़ल मकदु,
जैसे सेहरा में रात फुलों की॥
फ़िल्म: बाज़ार
गीत: लता मंगेशकर एवं तलत अजीज़
लता मंगेशकर
"संगीत है स्वर इश्वर की,
सुर-साधना में है माँ शारदा का नाम,
रागी जो सुनाये रागिनी,
तो रोगी को मिले आराम॥"
-- लता मंगेशकर को समर्पित।
सौजन्य- अखिल भारतीय रेडियो (बोल: 'श्री अमिन सायनी')
सुर-साधना में है माँ शारदा का नाम,
रागी जो सुनाये रागिनी,
तो रोगी को मिले आराम॥"
-- लता मंगेशकर को समर्पित।
सौजन्य- अखिल भारतीय रेडियो (बोल: 'श्री अमिन सायनी')
Tuesday, September 29, 2009
मजबूरियां
....कुछ मजबूरियों का आलम देखो,
उन्हें देख कर भी मुस्करा न सके....
....और तो और अपनी दास्ताँ-ऐ-दिल,
मचले खूब, पर लवो पर छा न सके....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
उन्हें देख कर भी मुस्करा न सके....
....और तो और अपनी दास्ताँ-ऐ-दिल,
मचले खूब, पर लवो पर छा न सके....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
Thursday, September 24, 2009
इनाम
ऐ रौशनी-ऐ-तवअब् तेरा नाम कौन ले,
दानिस्ता अपनी जात् पर, इल्जाम कौन ले,
अहल-ऐ-हुनर की जान पर बन आए भी तो क्या,
अता में मिले अगर तो, इनाम कौन ले॥
रचनाकार - 'कैसर'
दानिस्ता अपनी जात् पर, इल्जाम कौन ले,
अहल-ऐ-हुनर की जान पर बन आए भी तो क्या,
अता में मिले अगर तो, इनाम कौन ले॥
रचनाकार - 'कैसर'
Monday, September 21, 2009
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है...
हमने भी इश्क के दायरे में शामिल होकर देखा,
इस दौर में एक सदमा अक्सर मिलता है,
मिलती नही वो, न उनका प्यार मिलता है, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥
छिपती छिपाती नजरो से भी बचकर उनके,
रस्ते पर एक दीवाना अक्सर मिलता है,
मिलती नही नज़रें, न रद-ऐ-अमल कभी, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥
सुर्ख आंखों से मुनाकिस लालिमा पलकों में दबाये,
जोहती भी नही मेरे दर्द-ऐ-तवास्सु़त अब तो,
इश्क-ऐ-दौर में ये सदमा अक्सर मिलता है,
कहाँ प्यार, यहाँ तो बस पत्थर मिलता है॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
इस दौर में एक सदमा अक्सर मिलता है,
मिलती नही वो, न उनका प्यार मिलता है, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥
छिपती छिपाती नजरो से भी बचकर उनके,
रस्ते पर एक दीवाना अक्सर मिलता है,
मिलती नही नज़रें, न रद-ऐ-अमल कभी, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥
सुर्ख आंखों से मुनाकिस लालिमा पलकों में दबाये,
जोहती भी नही मेरे दर्द-ऐ-तवास्सु़त अब तो,
इश्क-ऐ-दौर में ये सदमा अक्सर मिलता है,
कहाँ प्यार, यहाँ तो बस पत्थर मिलता है॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
Thursday, September 10, 2009
आजा रे.
अश्कों के बादल झूम के पुकारे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....
बिन तेरे लागे नाही रैना,
रंग नाही बिखरे, मन में ना चैना,
दूर ही से तू पर, झलक दिखा जा रे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....
परदेसी बालमवा तोरी नख तर जाऊ,
तेरी बलिहारी गीत-संगीत सुनाऊ,
चंद धडकनों की लाज बचा जा रे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....
बांवरी भई तोरी राह जहोते,
पूछत हारी, तोरी ख़बर ना मोहते,
म्हारी लास में साँस जगा जा रे,
आजा रे, आजा रे, परदेसी घर आजा रे...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....
बिन तेरे लागे नाही रैना,
रंग नाही बिखरे, मन में ना चैना,
दूर ही से तू पर, झलक दिखा जा रे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....
परदेसी बालमवा तोरी नख तर जाऊ,
तेरी बलिहारी गीत-संगीत सुनाऊ,
चंद धडकनों की लाज बचा जा रे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....
बांवरी भई तोरी राह जहोते,
पूछत हारी, तोरी ख़बर ना मोहते,
म्हारी लास में साँस जगा जा रे,
आजा रे, आजा रे, परदेसी घर आजा रे...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
Saturday, August 22, 2009
जग सुना सुना सा पराया सा लगता है.
क्यूँ सोचता हूँ तेरे बारे में अब मैं,
सब कुछ पराया-पराया सा लगता है,
जाने कौन सा मंज़र देखा है दिल ने,
खोया-खोया सा घबराया सा लगता है॥
आंसू आते भी नही और रुकते भी नही,
सैलाब जैसे दबाया सा लगता है,
राहगुज़र की बात क्या करूँ मैं,
आज हर अपना, पराया सा लगता है॥
अब तो महिना गर्मी का चल रहा है,
फ़िर ठण्ड क्यूँ आया-आया सा लगता है,
कितने अकेले हो गए हम अपनी राहो में,
आज हर रिश्ता पराया सा लगता है॥
कहते हैं की आइना हकीकत दिखलाता है,
पर आज आइना भी घबराया सा लगता है,
फूल मेरे हाथों का पुराना तो नही,
फ़िर आज क्यूँ यह मुरझाया सा लगता है॥
क्यूँ कोसते हैं लोग अँधेरी रात को,
आज तो सूरज भी शरमाया सा लगता है,
थोडी चांदनी है चिटक रही मेरे आँगन,
क्यूँ यह आँगन पराया सा लगता है॥
अकेले हैं भगवान् मन्दिर में ऐसे,
दुनिया का जैसे सताया सा लगता है,
खेवट क्यूँ रुकता है बीच नदी में,
आज क्यूँ यह पानी पराया सा लगता है॥
भागना तो तू भी जानता है ना वक्त,
आज क्यूँ रुका सा, सिथलाया सा लगता है,
मेरे आंसुवो का वज़न ना करा कभी,
यही तो अपना है, बाकी पराया सा लगता है॥
किस किस को गिनूंगा अपने दुश्मनों में,
हर दोस्त में दुश्मन आया सा लगता है,
तेज़ धुप में आज मेरी ही परछाई,
काली रात का घाना साया सा लगता है॥
खुशियाँ बची हैं कितनी नही जानता आज,
क्यूँ यह गला भर आया सा लगता है,
क्यूँ खामोश है जुबान मेरी आज,
हलक का हर शब्द हिलाया सा लगता है॥
आते आते जुबान पर दिल की दास्ताँ,
लम्हा लम्हा चित्राय सा लगता है,
अब बादल के बरसने का कैसा इंतज़ार,
जब हर मौसम ही पराया सा लगता है॥
कुछ खोया है मैंने, क्या खोया है मैंने,
आज जिंदगी अँधेरी छाया सा लगता है,
आंसुवो को भी पनाह नही मिलती चेहरे पर,
आज अपना ही चेहरा पराया सा लगता है॥
हर एक को देखता हूँ बड़ी तमन्ना से,
आज तो धड़कन भी दुसरे से चुराया सा लगता है,
नींद तो अब आती नही हमें रातो में,
जागते देखा हर सपना भी पराया सा लगता है॥
अपने पापो का दोष क्यूँ दू दुसरो को,
आज अपना ही जिस्म पराया सा लगता है,
क्यूँ इतना तरस खता है चित्रगुप्त मुझपर,
कभी प्राण आया, कभी जाया सा लगता है॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
सब कुछ पराया-पराया सा लगता है,
जाने कौन सा मंज़र देखा है दिल ने,
खोया-खोया सा घबराया सा लगता है॥
आंसू आते भी नही और रुकते भी नही,
सैलाब जैसे दबाया सा लगता है,
राहगुज़र की बात क्या करूँ मैं,
आज हर अपना, पराया सा लगता है॥
अब तो महिना गर्मी का चल रहा है,
फ़िर ठण्ड क्यूँ आया-आया सा लगता है,
कितने अकेले हो गए हम अपनी राहो में,
आज हर रिश्ता पराया सा लगता है॥
कहते हैं की आइना हकीकत दिखलाता है,
पर आज आइना भी घबराया सा लगता है,
फूल मेरे हाथों का पुराना तो नही,
फ़िर आज क्यूँ यह मुरझाया सा लगता है॥
क्यूँ कोसते हैं लोग अँधेरी रात को,
आज तो सूरज भी शरमाया सा लगता है,
थोडी चांदनी है चिटक रही मेरे आँगन,
क्यूँ यह आँगन पराया सा लगता है॥
अकेले हैं भगवान् मन्दिर में ऐसे,
दुनिया का जैसे सताया सा लगता है,
खेवट क्यूँ रुकता है बीच नदी में,
आज क्यूँ यह पानी पराया सा लगता है॥
भागना तो तू भी जानता है ना वक्त,
आज क्यूँ रुका सा, सिथलाया सा लगता है,
मेरे आंसुवो का वज़न ना करा कभी,
यही तो अपना है, बाकी पराया सा लगता है॥
किस किस को गिनूंगा अपने दुश्मनों में,
हर दोस्त में दुश्मन आया सा लगता है,
तेज़ धुप में आज मेरी ही परछाई,
काली रात का घाना साया सा लगता है॥
खुशियाँ बची हैं कितनी नही जानता आज,
क्यूँ यह गला भर आया सा लगता है,
क्यूँ खामोश है जुबान मेरी आज,
हलक का हर शब्द हिलाया सा लगता है॥
आते आते जुबान पर दिल की दास्ताँ,
लम्हा लम्हा चित्राय सा लगता है,
अब बादल के बरसने का कैसा इंतज़ार,
जब हर मौसम ही पराया सा लगता है॥
कुछ खोया है मैंने, क्या खोया है मैंने,
आज जिंदगी अँधेरी छाया सा लगता है,
आंसुवो को भी पनाह नही मिलती चेहरे पर,
आज अपना ही चेहरा पराया सा लगता है॥
हर एक को देखता हूँ बड़ी तमन्ना से,
आज तो धड़कन भी दुसरे से चुराया सा लगता है,
नींद तो अब आती नही हमें रातो में,
जागते देखा हर सपना भी पराया सा लगता है॥
अपने पापो का दोष क्यूँ दू दुसरो को,
आज अपना ही जिस्म पराया सा लगता है,
क्यूँ इतना तरस खता है चित्रगुप्त मुझपर,
कभी प्राण आया, कभी जाया सा लगता है॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Monday, August 17, 2009
बरसात
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
एक बूँद फ़िर बारिश की,
तपती भू की तृष्णा बढ़ा गई,
दूर बिजली चमकी आकाश में,
वो देखो बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
खुशी के आगमन के पहले ही,
खुशियों की तैयारी छा गई,
एक और बूँद ठंडी सी,
धरती के दिल में समा गई...
आहा बरसात आ गई...
कुछ कच्चे आँगन के फलो को,
देखो कितना इंतज़ार करा गई,
पीपल के पत्तो से टपकी बूँद,
मिटटी की खुशबू बढ़ा गई...
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
आहा बरसात आ गई...
एक बूँद फ़िर बारिश की,
तपती भू की तृष्णा बढ़ा गई,
दूर बिजली चमकी आकाश में,
वो देखो बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
खुशी के आगमन के पहले ही,
खुशियों की तैयारी छा गई,
एक और बूँद ठंडी सी,
धरती के दिल में समा गई...
आहा बरसात आ गई...
कुछ कच्चे आँगन के फलो को,
देखो कितना इंतज़ार करा गई,
पीपल के पत्तो से टपकी बूँद,
मिटटी की खुशबू बढ़ा गई...
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Friday, July 24, 2009
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है,
मैं भूखा सोता हूँ तो माँ भी भूखी सोती है,
एक रोटी ज्यादा मांग लूँ जो कभी मैं,
माँ कोने में आँखें भिगोती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
मेरी चारपाई की टूटी लकडी जब,
खट-खट कर मुझे जगोती है,
माँ तब हाथ में पाया थामे,
बैठे-बैठे ही सोती है....
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
सूखे खेतों में बरखा की आस में बैठे,
बछिया की भी आठ पहर होती है,
बनिए और महाजन की खरी-खोटी,
पापा के फटे जेबों पर बेअसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
मंडी के रस्ते में जब, बच्चे एकसाथ आते हैं,
तब स्कूल जाने को, हम भी तरस जाते हैं,
देख पापा की आंखों में लाचारी हम,
सोचते हैं अपनी, ऐसे तो गुज़र होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
बरसात की जब पहली बारिश,
छत से चू कर घर को भिगोती है,
तब माँ मुझको आँचल से ढक-कर,
बिन आंसू के ही रोती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
दीदी की शादी की कीमत, जब पंडित बताता है,
लड़की होने का ताना, दहेज़ बनकर आता है,
अपनी 'किस' भूल पर दीदी के दिल में,
देखो कितने अन्दर तक असर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
मैं भूखा सोता हूँ तो माँ भी भूखी सोती है,
एक रोटी ज्यादा मांग लूँ जो कभी मैं,
माँ कोने में आँखें भिगोती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
मेरी चारपाई की टूटी लकडी जब,
खट-खट कर मुझे जगोती है,
माँ तब हाथ में पाया थामे,
बैठे-बैठे ही सोती है....
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
सूखे खेतों में बरखा की आस में बैठे,
बछिया की भी आठ पहर होती है,
बनिए और महाजन की खरी-खोटी,
पापा के फटे जेबों पर बेअसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
मंडी के रस्ते में जब, बच्चे एकसाथ आते हैं,
तब स्कूल जाने को, हम भी तरस जाते हैं,
देख पापा की आंखों में लाचारी हम,
सोचते हैं अपनी, ऐसे तो गुज़र होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
बरसात की जब पहली बारिश,
छत से चू कर घर को भिगोती है,
तब माँ मुझको आँचल से ढक-कर,
बिन आंसू के ही रोती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
दीदी की शादी की कीमत, जब पंडित बताता है,
लड़की होने का ताना, दहेज़ बनकर आता है,
अपनी 'किस' भूल पर दीदी के दिल में,
देखो कितने अन्दर तक असर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Monday, July 20, 2009
अपना - पराया
कोई ताबीर ना उलटी होती,
हमने हर ख्वाब ही उल्टा देखा,
रंजिशें अपनों की याद आएँगी,
क्या कहूँ किसको पराया देखा।
शहर की इस भीड़ में 'कैसर' हमने,
एक-एक शक्श को तनहा देखा॥
रचनाकार - 'कैसर'
हमने हर ख्वाब ही उल्टा देखा,
रंजिशें अपनों की याद आएँगी,
क्या कहूँ किसको पराया देखा।
शहर की इस भीड़ में 'कैसर' हमने,
एक-एक शक्श को तनहा देखा॥
रचनाकार - 'कैसर'
Monday, July 13, 2009
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल...
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल.....
तू देख आज चमन में है रौशनी,
तुझे पुकारे है और यह कह रही,
अब दुनिया की बन्धनों से बाहर निकल,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
तेरा मस्तक क्यूँ है झुका हुआ,
चेहरा उदासियों से घिरा हुआ,
तोड़ के इन बन्धनों को आगे बढ़,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
तू उठा ले जो कदम तो,
आज रास्तो पर फूल बिखरेंगे,
क्यूँ करता है तू कल की फिकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
रोशन होगा तेरे कर्म से आज आज शमा
खिल उठ्येंगी बगियाँ, जाएगा तू जहाँ,
धर्म जात् को दरकिनार कर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ना सोच के तू कभी अकेला होगा,
तेरा इतिहास तुझसे कुछ नही पूछेगा,
अपने जेहन में विस्वास की चिंगारी जगाकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल.....
तू देख आज चमन में है रौशनी,
तुझे पुकारे है और यह कह रही,
अब दुनिया की बन्धनों से बाहर निकल,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
तेरा मस्तक क्यूँ है झुका हुआ,
चेहरा उदासियों से घिरा हुआ,
तोड़ के इन बन्धनों को आगे बढ़,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
तू उठा ले जो कदम तो,
आज रास्तो पर फूल बिखरेंगे,
क्यूँ करता है तू कल की फिकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
रोशन होगा तेरे कर्म से आज आज शमा
खिल उठ्येंगी बगियाँ, जाएगा तू जहाँ,
धर्म जात् को दरकिनार कर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ना सोच के तू कभी अकेला होगा,
तेरा इतिहास तुझसे कुछ नही पूछेगा,
अपने जेहन में विस्वास की चिंगारी जगाकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Wednesday, July 8, 2009
यूँही कभी ....
अपने होठों की हँसी चुनने की जब बारी आई,
तो आँखों के सामने एक सपना आया,
समंदर से सैलाब बह गया जाने क्यूँ,
तुम याद आए, यूँही कभी...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥
और तो कुछ नही, तेरा चेहरा था सामने,
कुछ पलकों से चिपकी ओस की बूँदें,
और हांथो में मेहंदी लागाये,
तुम याद आए, बस याद आए...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥
जाने क्यूँ सोचा कुछ लम्हा चुरा लूँ,
इतिहास के पन्नो से तुम्हे उठा लूँ,
जिगर-बंद कर लूँ उन धडकनों को,
जब तुम याद आए, बस याद आए,
हाँ याद आए, बहुत याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
तो आँखों के सामने एक सपना आया,
समंदर से सैलाब बह गया जाने क्यूँ,
तुम याद आए, यूँही कभी...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥
और तो कुछ नही, तेरा चेहरा था सामने,
कुछ पलकों से चिपकी ओस की बूँदें,
और हांथो में मेहंदी लागाये,
तुम याद आए, बस याद आए...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥
जाने क्यूँ सोचा कुछ लम्हा चुरा लूँ,
इतिहास के पन्नो से तुम्हे उठा लूँ,
जिगर-बंद कर लूँ उन धडकनों को,
जब तुम याद आए, बस याद आए,
हाँ याद आए, बहुत याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'
Friday, May 1, 2009
अभी हारने की बारी नही आई....
जिंदगी बहुत बड़ी नही थी,
जीने की कोशिश किए जा रहा था,
किसी कदम पर लगता था की खुश हूँ,
पर गम के आंसू पिए जा रहा था॥
फ़िर एक दिन आँख खुली अक्ल की,
देखा अंधेरे में भटक मैं,
अपनी जिंदगी में अपनों से,
अनजान दूरियां बढ़ा रहा था॥
बेनामी जिद्द में ऐसा अकडा था,
हर कदम पर टूटता जा रहा था,
कभी नींद नसीब होगी चैन की,
इसी इंतज़ार में नींदें उदा रहा था॥
टूटने का असर तो दिल पर हो रहा था,
चहरे पर झुर्रियां क्यूँ बढ़ता जा रहा था,
शायदना मिलने वाली मौत की उम्मीद में,
जिंदगी से हार कर भी, बस जिए जा रहा था॥
...............................................................
पर एक उम्मीद है अभी बाकी,
अभी देखा है जिंदगी का आधा सच,
बाकी आधा तो देखना है हंसकर,
फ़िर क्या करूँगा इतनी जल्दी मरकर॥
नही-नही मैं अभी नही मरूँगा,
जिंदगी से अभी समझौता नही करूँगा,
उसने जितने तीर थे तरकस में चलाये,
पर मेरी निष्ठां को नही डिगा पाए॥
कल तो किसी ने नही देखा है जानता हूँ,
फ़िर आज क्यूँ मैं हार मानता हूँ,
हर राह पर मैं जीत तो नही सका,
पर अभी हारा नही हूँ यही मानता हूँ॥
मैं आऊंगा और सर उठा कर चलूँगा,
हर गली से अपनी विस्वास की ऊँगली पकड़ निकलूंगा,
तुम भी मिलोगे रस्ते पर कहीं, मेरे मुक्कदर,
इंतज़ार करो, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा।
हाँ, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
जीने की कोशिश किए जा रहा था,
किसी कदम पर लगता था की खुश हूँ,
पर गम के आंसू पिए जा रहा था॥
फ़िर एक दिन आँख खुली अक्ल की,
देखा अंधेरे में भटक मैं,
अपनी जिंदगी में अपनों से,
अनजान दूरियां बढ़ा रहा था॥
बेनामी जिद्द में ऐसा अकडा था,
हर कदम पर टूटता जा रहा था,
कभी नींद नसीब होगी चैन की,
इसी इंतज़ार में नींदें उदा रहा था॥
टूटने का असर तो दिल पर हो रहा था,
चहरे पर झुर्रियां क्यूँ बढ़ता जा रहा था,
शायदना मिलने वाली मौत की उम्मीद में,
जिंदगी से हार कर भी, बस जिए जा रहा था॥
...............................................................
पर एक उम्मीद है अभी बाकी,
अभी देखा है जिंदगी का आधा सच,
बाकी आधा तो देखना है हंसकर,
फ़िर क्या करूँगा इतनी जल्दी मरकर॥
नही-नही मैं अभी नही मरूँगा,
जिंदगी से अभी समझौता नही करूँगा,
उसने जितने तीर थे तरकस में चलाये,
पर मेरी निष्ठां को नही डिगा पाए॥
कल तो किसी ने नही देखा है जानता हूँ,
फ़िर आज क्यूँ मैं हार मानता हूँ,
हर राह पर मैं जीत तो नही सका,
पर अभी हारा नही हूँ यही मानता हूँ॥
मैं आऊंगा और सर उठा कर चलूँगा,
हर गली से अपनी विस्वास की ऊँगली पकड़ निकलूंगा,
तुम भी मिलोगे रस्ते पर कहीं, मेरे मुक्कदर,
इंतज़ार करो, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा।
हाँ, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा॥
रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।
Monday, April 6, 2009
आप किस मुद्दे पर वोट देना चाहेंगे?
आम चुनाव मुह खोले खड़ा है, यह वो समय है जब हमारा एक फैसला हमारे लिए आने वाले पाँच वर्षो तक अपनी छाप छोड़ता रहेगा। चाहे बुरा हो या भला हो, पर इस चुनाव का आसार तो सिर्फ़ हम पर ही पड़ेगा, क्यूँ की हम ही तो मध्यम वर्ग के इंसान हैं। हाँ मध्यम जिसकी सिर्फ़ एक जिम्मेदारी है यहाँ के लोकतंत्र में, वो है वोट डालने की। और एक जिम्मेदारी जो मध्यम बर्ग ने उठा राखी है वो है, पाँच साल तक इंतज़ार करने की की अगला वोट कब डालेंगे जब उनको कुछ लोग मुफ्त में उपहार और भोजन देंगे। वैसे भी, इसके अलावा और कुछ की समझ हो भी नही पाई है हम मध्यम बर्ग को। तो, सवाल यह है की आप, यानी मध्यम्बर्ग किस मुद्दे को ध्यान में रख कर वोट कर रहा है? उदहारण के लिए मैं कुछ मुद्दों को याद दिला रहा हूँ जो आप के वोट देने की वज़ह हो सकते हैं शायद। बेरोज़गारी, महंगाई, धर्म, जाती, विकाश, कोटा, आरक्षण, गरीबी इत्यादि-इत्यादि...
मैंने बहुत सोचा, और सोचा तो यह पाया की हर हालत में हमें इस बार वोट डालने के लिए सबसे पहले हमें अपनी समझ से यह साबित करने के लिए वोट डालना है की हम बदल रहे हैं। हम अब किसी के हात के मोहरे नही हैं, और अपनी भलाई के लिए क्या करने और क्या नही करने की जरुरत है हम जानते हैं। किसी को यह बताने की या जताने की जरुरत नही है की हम किस को और क्यूँ वोट डालें। इस बार वोट डालने का सबसे बड़ा मुद्दा यह है की हम अब साधारण लोग नही हैं, या यूँ कहें की कोई विशिस्ट लोग नही हैं जो हमारा प्रतिनिधित्वा करेंगे। हम में से ही कोई एक हमारा प्रतिनिधि बनेगा और उसके नाम से हम नही, बल्कि हमारे विकाश से वो पहचाना जाएगा। मेरी पहली प्राथमिकता यह है की हर व्यक्ति इतना समझदार बने की सही और ग़लत का अन्तर वो बहुत आसानी से समझ सके। जरुरत आधिकार की नही है, बल्कि जरुरत पहले से ही प्राप्त अधिकारों को समझने और उनके इस्तेमाल करने की है। मैं किसी भी धर्म या जाती का पक्ष नही लेना चाहता हूँ, लेकिन कहना चाहता हूँ की अपने धर्म और जाती को मानना जितना जरुरी है उतना ही बाकी लोगो के धर्म और जाती का समान करना है। अतः धर्म और जाती के नाम पर इस बार का वोट डालने के पक्ष में मैं बिल्कुल नही हूँ, बल्कि मैं कभी भी उस के पक्ष में नही हूँ क्यूंकि यह तो पुरी तारक व्यक्तिगत विषय है की कौन किस धर्म या जाती का है। अशिक्षित लोगो में गिना जन मुझे एक गाली की तरह लगता है, इस लिए मैं यह नही चाहता हूँ की हम में से कोई भी अशिक्षित रहे। शिक्षा का सिर्फ़ अधिकार ही नही, बल्कि शिक्षा का विस्तार और शिक्षा का स्तर मेरे चुनावी मुद्दे हैं। २ या ३ रुपये किलो मिलने वाला राशन मेरा मोह नही आकर्षित कर सकते हैं, क्यूँ की इस बार का चुनावी मुद्दा यह नही है मेरा की कौन कितने रुपये किलो आनाज बेचेगा। मेरा मुद्दा है, हम में से कोई इस स्तर का गरीब हो ही क्यूँ की उसे किसी सरकार को चुनना पड़े जो उसकी गरीबी पर आनाज बांटने का दिखावा कर के हँसता हो।
मैंने बहुत सोचा, और सोचा तो यह पाया की हर हालत में हमें इस बार वोट डालने के लिए सबसे पहले हमें अपनी समझ से यह साबित करने के लिए वोट डालना है की हम बदल रहे हैं। हम अब किसी के हात के मोहरे नही हैं, और अपनी भलाई के लिए क्या करने और क्या नही करने की जरुरत है हम जानते हैं। किसी को यह बताने की या जताने की जरुरत नही है की हम किस को और क्यूँ वोट डालें। इस बार वोट डालने का सबसे बड़ा मुद्दा यह है की हम अब साधारण लोग नही हैं, या यूँ कहें की कोई विशिस्ट लोग नही हैं जो हमारा प्रतिनिधित्वा करेंगे। हम में से ही कोई एक हमारा प्रतिनिधि बनेगा और उसके नाम से हम नही, बल्कि हमारे विकाश से वो पहचाना जाएगा। मेरी पहली प्राथमिकता यह है की हर व्यक्ति इतना समझदार बने की सही और ग़लत का अन्तर वो बहुत आसानी से समझ सके। जरुरत आधिकार की नही है, बल्कि जरुरत पहले से ही प्राप्त अधिकारों को समझने और उनके इस्तेमाल करने की है। मैं किसी भी धर्म या जाती का पक्ष नही लेना चाहता हूँ, लेकिन कहना चाहता हूँ की अपने धर्म और जाती को मानना जितना जरुरी है उतना ही बाकी लोगो के धर्म और जाती का समान करना है। अतः धर्म और जाती के नाम पर इस बार का वोट डालने के पक्ष में मैं बिल्कुल नही हूँ, बल्कि मैं कभी भी उस के पक्ष में नही हूँ क्यूंकि यह तो पुरी तारक व्यक्तिगत विषय है की कौन किस धर्म या जाती का है। अशिक्षित लोगो में गिना जन मुझे एक गाली की तरह लगता है, इस लिए मैं यह नही चाहता हूँ की हम में से कोई भी अशिक्षित रहे। शिक्षा का सिर्फ़ अधिकार ही नही, बल्कि शिक्षा का विस्तार और शिक्षा का स्तर मेरे चुनावी मुद्दे हैं। २ या ३ रुपये किलो मिलने वाला राशन मेरा मोह नही आकर्षित कर सकते हैं, क्यूँ की इस बार का चुनावी मुद्दा यह नही है मेरा की कौन कितने रुपये किलो आनाज बेचेगा। मेरा मुद्दा है, हम में से कोई इस स्तर का गरीब हो ही क्यूँ की उसे किसी सरकार को चुनना पड़े जो उसकी गरीबी पर आनाज बांटने का दिखावा कर के हँसता हो।
कुछ ना होने का गम किसे है....
कुछ ना होने का गम किसे है,
अपनी तो यहाँ कुछ भी नही है हस्ती।
कलम के दरोगा ने जो थामी है चुप्पी,
कहते हैं राम-रहीम चुनाव के नारे॥
चलती है जात-धर्म की चरखी,
बंटते हैं नोट, वोट के पहले।
क्या मांगता हूँ मैं भिखारी,
नेता हमारी आवाज़ काहे को सुन ले॥
रुक जा, आ जा, हमारे करीब तू तो,
तेरी कमी है अब जिंदगी में,
हाँ जिंदगी, यही नही है अब जिंदगी में॥
कब बन गए हम अपने ही चुने हुए के दास,
ना अपनी अपना बची, ना बची आन।
फ़िर भी हमने तेरे विरोध का राह नही चुना।
अपनी तो यहाँ कुछ भी नही है हस्ती।
कलम के दरोगा ने जो थामी है चुप्पी,
कहते हैं राम-रहीम चुनाव के नारे॥
चलती है जात-धर्म की चरखी,
बंटते हैं नोट, वोट के पहले।
क्या मांगता हूँ मैं भिखारी,
नेता हमारी आवाज़ काहे को सुन ले॥
रुक जा, आ जा, हमारे करीब तू तो,
तेरी कमी है अब जिंदगी में,
हाँ जिंदगी, यही नही है अब जिंदगी में॥
कब बन गए हम अपने ही चुने हुए के दास,
ना अपनी अपना बची, ना बची आन।
फ़िर भी हमने तेरे विरोध का राह नही चुना।
Saturday, April 4, 2009
कहीं दीप जले कहीं दिल....
इतनी मंहगाई, और ऊपर से नौकरियों का खतरा,
इसमें कोई रसोई की गैस या गड्डी में पेट्रोल कैसे जलाये,
इसीलिए, मैंने भी यही सोचा है की दीप को जलने दो,
अमीरों के गलियारों को रौशन करने दो, अपनी तो दिल जलने से भी चल जायेगी....
भले ही सरकारी दफ्तारोके चक्कर काटते काटते,
और प्राइवेट नौकरियों के गलियों से हमारी जिंदगी अंधेरी हो जाए.....
हमारे मेहनत से दिया टैक्स और उसकी मंगाई पेट्रोल पर तो नेताओ का ही आधिकार है....
वे ही इन्हे जलाये, वे ही रोशनी पाए.......
क्या फर्क पड़ता है, हमारे पास तो जलाने के लिए दिल है ही.....
भले किसी नारी की वज़ह से, या आपसी रंजिशो की वज़ह से.....
आख़िर टूटा हुआ दिल हम और करेंगेभी क्या,.....
सो इसे ही जला जला कर हम अपना जहाँ रोशन करते रहेंगे.....
और हम जैसो की तो कमी भी नही है.......
ना चाहो तो भी हम जैसो से ही हर रोज़ सामना हो जाए.....
हम दिलजले तो हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं.....
यही मुक्कदर है की, कल भी जले थे, आज भी जल रहे हैं.....
रोक सकता कोई तो रोक लेता जलने से इनको....
पर वो भी सम्भव नही है.... यही दिल जलना चाहे तो कोई क्या करे...
दिल की आग बुझाओ, आग लगनी है तो पेट्रोल और गैस में आग लगाओ....
फ़िर साथ में सुर लगायेंगे..... कहीं दीप जले कहीं दिल....
इसमें कोई रसोई की गैस या गड्डी में पेट्रोल कैसे जलाये,
इसीलिए, मैंने भी यही सोचा है की दीप को जलने दो,
अमीरों के गलियारों को रौशन करने दो, अपनी तो दिल जलने से भी चल जायेगी....
भले ही सरकारी दफ्तारोके चक्कर काटते काटते,
और प्राइवेट नौकरियों के गलियों से हमारी जिंदगी अंधेरी हो जाए.....
हमारे मेहनत से दिया टैक्स और उसकी मंगाई पेट्रोल पर तो नेताओ का ही आधिकार है....
वे ही इन्हे जलाये, वे ही रोशनी पाए.......
क्या फर्क पड़ता है, हमारे पास तो जलाने के लिए दिल है ही.....
भले किसी नारी की वज़ह से, या आपसी रंजिशो की वज़ह से.....
आख़िर टूटा हुआ दिल हम और करेंगेभी क्या,.....
सो इसे ही जला जला कर हम अपना जहाँ रोशन करते रहेंगे.....
और हम जैसो की तो कमी भी नही है.......
ना चाहो तो भी हम जैसो से ही हर रोज़ सामना हो जाए.....
हम दिलजले तो हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं.....
यही मुक्कदर है की, कल भी जले थे, आज भी जल रहे हैं.....
रोक सकता कोई तो रोक लेता जलने से इनको....
पर वो भी सम्भव नही है.... यही दिल जलना चाहे तो कोई क्या करे...
दिल की आग बुझाओ, आग लगनी है तो पेट्रोल और गैस में आग लगाओ....
फ़िर साथ में सुर लगायेंगे..... कहीं दीप जले कहीं दिल....
Wednesday, March 11, 2009
मैंने कब रोका है...
मैंने कब रोका है तूफानों को चलने से,
मैंने कब रोका है अरमानो को पिघलने से,
मैं तो कहता हूँ लगा दो आग जितनी दिल में हो,
मैं तो कहता हूँ दिखा दो प्यार जितनी दिल में हो॥
देखना वक्त ख़ुद-ब्-ख़ुद तुम्हारा गुलाम हो जाएगा,
एक कसक सी जागेगी दिल में और दिल मचल जाएगा,
आरजू तो तुम्हारी भी यही है इजहार-ऐ-काफिर,
फरमा के देखो, दिल तो दिल है, पत्थर भी पिघल जाएगा॥
कौन रोका है मुझे आसमा पर चढ़ने से,
पर तुम भी नही आई, तन्हाई में बुलाने से,
तमन्ना थी की आखरी साँस में तुम्हारा आगाज़ हो,
अब कफ़न भी तनहा रहता है तेरे चले जाने से॥
- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'
मैंने कब रोका है अरमानो को पिघलने से,
मैं तो कहता हूँ लगा दो आग जितनी दिल में हो,
मैं तो कहता हूँ दिखा दो प्यार जितनी दिल में हो॥
देखना वक्त ख़ुद-ब्-ख़ुद तुम्हारा गुलाम हो जाएगा,
एक कसक सी जागेगी दिल में और दिल मचल जाएगा,
आरजू तो तुम्हारी भी यही है इजहार-ऐ-काफिर,
फरमा के देखो, दिल तो दिल है, पत्थर भी पिघल जाएगा॥
कौन रोका है मुझे आसमा पर चढ़ने से,
पर तुम भी नही आई, तन्हाई में बुलाने से,
तमन्ना थी की आखरी साँस में तुम्हारा आगाज़ हो,
अब कफ़न भी तनहा रहता है तेरे चले जाने से॥
- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'
Tuesday, March 10, 2009
दोस्तों के बीच छिटके कुछ पत्र
पहला पत्र : अमित सिन्हा द्वारा
"क्यूँ रखूं अपने कलम में स्याही,
जब कोई अरमां दिल में मचलता नही।
ना जाने क्यूँ सब शक़ करते हैं मुझपर,
जब कोई मुस्कराते चहरे के दर्द को समझता नही।
अगर मिले खुदा तो उससे मांगूंगा अपना प्यार,
पर सुना है कि मरने से पहले वो मिलता नही॥"
दूसरा पत्र : नीरज पाठक द्वारा
"एक दुआ खुदा से ये भी...
रहे हर पल मेरे कलम में स्याही,
कुछ कहानी तुमने लिखी कुछ मैंने बनाई।
शक़ की बुनियाद गहरी नही होती मेरे दोस्त,
मोह्हबत का दस्तूर ही है जुदाई।
खुदा क्या दिलाएगा मुझे मेरा प्यार,
तक़दीर से गिला उसको हो, जो मेरी न हो पाई।"
तीसरा पत्र : आनंद मिश्रा द्वारा
"क्या दुआ करुँ, क्या दवा करूँ...
क्या खुदा और क्या खुदा की खुदाई,
जब मेरे हाथ का कलम ही टूटा है,
तो कैसी कहानी और किस काम की स्याही।
मोह्हबत का राज़ बताने वाले ये भी बता,
किसने लिखी किस्मत और क्यूँ लिखी जुदाई।
चर्चा तो मेरे मरने पर भी बंद ना होगा,
फ़िर कैसा प्यार, और कैसी वफाई।"
- अपनी राय अवश्य दें -- धन्यबाद ।
"क्यूँ रखूं अपने कलम में स्याही,
जब कोई अरमां दिल में मचलता नही।
ना जाने क्यूँ सब शक़ करते हैं मुझपर,
जब कोई मुस्कराते चहरे के दर्द को समझता नही।
अगर मिले खुदा तो उससे मांगूंगा अपना प्यार,
पर सुना है कि मरने से पहले वो मिलता नही॥"
दूसरा पत्र : नीरज पाठक द्वारा
"एक दुआ खुदा से ये भी...
रहे हर पल मेरे कलम में स्याही,
कुछ कहानी तुमने लिखी कुछ मैंने बनाई।
शक़ की बुनियाद गहरी नही होती मेरे दोस्त,
मोह्हबत का दस्तूर ही है जुदाई।
खुदा क्या दिलाएगा मुझे मेरा प्यार,
तक़दीर से गिला उसको हो, जो मेरी न हो पाई।"
तीसरा पत्र : आनंद मिश्रा द्वारा
"क्या दुआ करुँ, क्या दवा करूँ...
क्या खुदा और क्या खुदा की खुदाई,
जब मेरे हाथ का कलम ही टूटा है,
तो कैसी कहानी और किस काम की स्याही।
मोह्हबत का राज़ बताने वाले ये भी बता,
किसने लिखी किस्मत और क्यूँ लिखी जुदाई।
चर्चा तो मेरे मरने पर भी बंद ना होगा,
फ़िर कैसा प्यार, और कैसी वफाई।"
- अपनी राय अवश्य दें -- धन्यबाद ।
कुछ दर्द भरे नगमे
तेरे रोने की ख़बर मेरे आंखों से यूँ निकलती है,
जैसे कोई दुल्हन बिदाई के आंसू में पिघलती है।
किसी कोने से लिपट के देखूंगा की ये मोती कितने महेंगे है,
और देखूंगा की क्या मेरी गरीबी इनको कभी खरीद पायेगी?
कुछ ना होने पर मेरी जिरह का जुगाड़ यही होगा,
आज ताज़ा है यह मोती, जरुर महंगा होगा।
मुझे देख कोई हँसता नही अब गलियों में,
हर मोड़ पर ये मोतियाँ कौडियों के भाव बिकती हैं।
सौदा तो मेरा कभी ना हो सका बाज़ार में,
आज तेरी बेवफाई को बिकते देखा इश्तेहार में।
चाहता था के सबकुछ खर्च कर तुझको पा लूँ,
ये ख्वाब था, ख्वाब ही रहा की तुझे अपना लूँ।
दूर की धुंध में अब दानिस्ता ही कोई चिंगारी दिखती है,
यह नई दुनिया है, यहाँ चलचित्र नही, चरित्र बिकती है।
हर घड़ी अपने को हताश अपने इतिहास में देखता हूँ,
पर तेरे मोतियों के पर्दों पार, पूरी दुनिया अँधेरी दिखती है।
तन्हाई का बादल हमें ही क्यूँ भिंगोता है,
क्यूँ तेरी तस्वीर से ही हमेशा गुफ्तगू होता है।
वक्त का हम और कर्ज़दार नही होना चाहते,
तुझसे जुदा हैं, पर तेरी जुदाई का गम नही खोना चाहते॥
- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'
जैसे कोई दुल्हन बिदाई के आंसू में पिघलती है।
किसी कोने से लिपट के देखूंगा की ये मोती कितने महेंगे है,
और देखूंगा की क्या मेरी गरीबी इनको कभी खरीद पायेगी?
कुछ ना होने पर मेरी जिरह का जुगाड़ यही होगा,
आज ताज़ा है यह मोती, जरुर महंगा होगा।
मुझे देख कोई हँसता नही अब गलियों में,
हर मोड़ पर ये मोतियाँ कौडियों के भाव बिकती हैं।
सौदा तो मेरा कभी ना हो सका बाज़ार में,
आज तेरी बेवफाई को बिकते देखा इश्तेहार में।
चाहता था के सबकुछ खर्च कर तुझको पा लूँ,
ये ख्वाब था, ख्वाब ही रहा की तुझे अपना लूँ।
दूर की धुंध में अब दानिस्ता ही कोई चिंगारी दिखती है,
यह नई दुनिया है, यहाँ चलचित्र नही, चरित्र बिकती है।
हर घड़ी अपने को हताश अपने इतिहास में देखता हूँ,
पर तेरे मोतियों के पर्दों पार, पूरी दुनिया अँधेरी दिखती है।
तन्हाई का बादल हमें ही क्यूँ भिंगोता है,
क्यूँ तेरी तस्वीर से ही हमेशा गुफ्तगू होता है।
वक्त का हम और कर्ज़दार नही होना चाहते,
तुझसे जुदा हैं, पर तेरी जुदाई का गम नही खोना चाहते॥
- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'
Saturday, January 17, 2009
एक मुद्दत से मुलाकात की तमन्ना कुछ यूँ पूरी हुई...
आए थे मुखातिर होने,
और दर्द को मेरे जगा गए।
वो, जिनके करीब थे हम,
हमसे दूरियां गिना गए॥
रोये भी वो, फ़ोन पर तो,
धड़कन अपनी सुना गए।
नज़र हमसे मिलाया नही,
मजबूरियां दिल की बता गए॥
कहाँ हम उनसे मिले आज,
वो तो, किस्सा दुसरो का सुना गए।
मुस्कराए भी मन-मसोस कर,
फ़िर, गीलीं पलकें झपका गए॥
पूछना था हाल उनका हमें,
वो हमें बेहाली की वज़ह ठहरा गए।
हमने कहा, हम कौन हैं अब,
वो घर का खाली कोना दिखा गए॥
ना हम उनसे, ना वो हमसे मिले,
ये उनकी ही मर्ज़ी थी आशात्।
मुलाकात तो किसी और से हुई,
हम तो, बस गए और आ गए॥
अब....... फ़िर यूँ तमन्ना, कभी........ जगे - न- जगे ...... ॥
रचनाकार - आनंद मिश्रा।
और दर्द को मेरे जगा गए।
वो, जिनके करीब थे हम,
हमसे दूरियां गिना गए॥
रोये भी वो, फ़ोन पर तो,
धड़कन अपनी सुना गए।
नज़र हमसे मिलाया नही,
मजबूरियां दिल की बता गए॥
कहाँ हम उनसे मिले आज,
वो तो, किस्सा दुसरो का सुना गए।
मुस्कराए भी मन-मसोस कर,
फ़िर, गीलीं पलकें झपका गए॥
पूछना था हाल उनका हमें,
वो हमें बेहाली की वज़ह ठहरा गए।
हमने कहा, हम कौन हैं अब,
वो घर का खाली कोना दिखा गए॥
ना हम उनसे, ना वो हमसे मिले,
ये उनकी ही मर्ज़ी थी आशात्।
मुलाकात तो किसी और से हुई,
हम तो, बस गए और आ गए॥
अब....... फ़िर यूँ तमन्ना, कभी........ जगे - न- जगे ...... ॥
रचनाकार - आनंद मिश्रा।
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