Monday, July 22, 2013

हँसना आसान था उस रोज़ मगर...

हँसना आसान था उस रोज़ मगर,
रोने का ही मौसम था|
कुछ आंसू सुख गए थे,
कुछ आंसू से आँख नम था||

तुम्हे देखा यूँ अकेले जाते,
ख्वाब था याये वहम था|
दूर होती जिंदगी मुझ-से,
यद्दपिबीच फासला कम था||

तब की बात और थी जब,
प्यार का रास्ता दुर्गम था|
तुम तो तब से साथ नहीं थी,
जब प्यार ही प्यार का मौसम था||

जाने सुबह से ही क्यूँ,
हवा भी सुस्त-माध्यम था|
कुछ मेरी खुशियों जैसा,
कुछ रिश्ते सा बे-दम था||

हँसना आसान था उस रोज़ मगर,
रोने का ही मौसम था||



















रचनाकार -
आनंद मिश्र

Wednesday, February 1, 2012

मात्र-भूमि

जीवन-पुष्प चढ़ा चरणों पर,
मांगें मात्र-भूमि से यह वर,
तेरा वैभव अमर रहे माँ,
हम दिन चार रहे-न-रहे||

- अज्ञात !

नींद नहीं आई...

खली किस कि कमी कि, रात नींद नहीं आई,
बाहर कि बरसात या पलकों कि, जो नींद नहीं आई,
लोग तो कह लेंगे पागल और हस लेंगे मुझ पर,
पर क्या थी उसकी बात जो नींद नहीं आई,

कोई भूला क्यूँ याद आया बरसो पर फिर से मुझको,
उसकी यादो कि खुमारी थी, या दर्द कि बरात जो नींद नहीं आई,
वो भुला न सका रात, बड़ी लम्बी थी वो रात,
आज कि रात हुई फिर से वही हालात और नींद नहीं आई.

उन्हें भूलने की थी जिद्द और मुझे मानाने की खलूस,
किस मोड़ पर जा अटकी मेरी सांस, जो नींद नहीं आई,
उनका रूठना भी वाजिब, मेरा पूछना भी गुनाह,
वो सज़ा थी या सौगात, जो नींद नहीं आई!

रचनाकार -
आनंद मिश्र 

Thursday, April 15, 2010

ग़ज़ल लिखता हूँ

दर्द-ए-वह्शत: पर ग़ज़ल लिखता हूँ,
पहले जैसा कहाँ मैं आज-कल लिखता हूँ|

फुरकत के पल दो पल तुझ-संग बिताये याद हैं,
पर कलम उठा कर वही, तन्हाई के पल लिखता हूँ|

तुम देखते हो चेहरे की हंसी को आशुफ्तः: से,
मैं आँखों की नमी, और उनकी हलचल लिखता हूँ|

वफ़ा की ना की, किसे पड़ी है वाहिमः:-ए-बाज़ार में,
वज्द की कहानी तू लिख, मैं हर्जः-ए-ग़ज़ल लिखता हूँ|

दर्द-ए-वह्शत: पर ग़ज़ल लिखता हूँ,
पहले जैसा मैं कहाँ आज-कल लिखता हूँ||

रचनाकार – ‘आनंद मिश्र’

शब्दार्थ:
वह्शत: – अकेलापन, loneliness
आशुफ्तः: – असमंजस में, perplexed, confused
वाहिमः: – दिखावटी, fancy, whim, imagination
वज्द: – बे-इन्तेहा प्यार, excessive love, ecstasy, rapture
हर्जः: – फ़िज़ूल, nonsense, absurd, vain, frivolous

Monday, April 5, 2010

शक़ कि शाख़ पर...

शक़ कि शाख़ पर,
बैठा है मात ताक़ पर,
दे ग़र हवा भी तू तो,
झुलसेगा तू ही आग पर॥

भाग ले, जाग ले,
न बैठ किसी फ़िराक पर,
ले चला है कारवां जो तू,
थम जाये न कहीं राख पर॥

कर्म से न विमूढ़ हो,
फ़र्ज़ से न दूर हो,
है रोष ग़र फ़िरोज़ में तो,
लिख नाम इसी आग पर॥

पग बढ़ा, न डगमगा,
है अकेला नहीं तू राह पर,
जो टूट गया, सो छूट गया,
बस लाशें थमी हैं आह पर॥

ग़र्क कि शाख़ पर,
बैठा है मौत ताक़ पर,
ढूंढ तेरी हस्ती का चर्चा,
डूब जाये न इसी मज़ाक पर॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ॥

Tuesday, March 23, 2010

पुनः इश्क का नया दांव मत दो

मुझे उमीदों के घाव मत दो,
जुल्फों कि घनी छाँव मत दो,
दर्द का प्याला भरा है अभी,
स्नेह कि मीठी अलाव मत दो।

दूर अभी तुमसे कहाँ हुआ हूँ,
रिश्तों को अभी से पड़ाव मत दो,
रंजिशें, साजिशें बहुत देखी,
किलकारी शब्दों का हिसाव मत दो।

दर्द दो, हया दो, तम दो त्याग दो,
खरी खोटी और जली बद्दुआ दो,
पलकों कि नशीली झुकाव मत दो,
पुनः इश्क का नया दांव मत दो॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ॥

Friday, March 5, 2010

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ...

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी आँखों में उतर जाऊ,

अनचाहा शोर है गूंजता एक तरफ,
और उनकी धडकनों कि ताल एक तरफ,
एक मधुर अन्तरंग मैं बन जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी धडकनों में बिखर जाऊ॥

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी आँखों में उतर जाऊ

खटक रहा कांटा मन में दुनिया का,
वक़्त के बे-वक़्त नज़ारें छोड़,
एक बे-वाक् आवारगी में बदल जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी सांसों में पिघल जाऊ

एक खुबसूरत ख्वाब में तर जाऊ,
है तमन्ना ऐसी कि उनकी आँखों में उतर जाऊ


रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ।

Tuesday, March 2, 2010

कुछ अँधेरा क्यूँ है...

दर्द-ए-तन्हाई का और आलम क्या बताएं,
मुद्दतें हो गई हैं, हमें मुस्कुराये,
मेरी ख़ामोशी को भी आजकल शिकायत है मुझसे,
राज़ उनसे कहें, या तनहा छोड़ जायें॥

कुछ तम सा था कभी तेरे आने से मन में,
सबकुछ ख़तम सा है तेरे जाने के बाद,
दो-पहर कि धूप भी अब, अँधेरा दूर नहीं करती,
तेरी यादों के छाए से दूर जायें तो कैसे जायें॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्र' ।

Friday, February 19, 2010

हुनर !!

जाने उस शक्श को कैसा ये हुनर आता है,
रात होती है तो आँखों में उतर आता है,
मैं उस के ख्याल से बचकर कहाँ जाऊं,
वो मेरी सोच कि हर राह पर नज़र आता है॥

आँखों में बनती ख्याल-ए-तस्वीर उसकी,
कभी फूल तो कभी संगीत-ए-ग़ज़ल आता है,
डूबे तो हर गहराई से निकल आयेंगे आशात्,
तेरी आँखों में अथाह समंदर नज़र आता है॥

रचनाकार - अज्ञात एंव 'आनंद मिश्रा' ।

Thursday, November 19, 2009

ग़म

तो क्या ग़म है,
की हमारी आँखें नम हैं,
यह तो खुशी के आंसू हैं,
जो आपकी आंखों में कम हैं॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।

Friday, October 23, 2009

भारत की प्रमुख नदियाँ!

गंगा, यमुना, गोमती,
सरयू, गंडक जान,
तीस्ता, कोशी, चम्बल,
सिंध, झेलम ले नाम,
रावी, कृष्णा, कावेरी,
गोदावरी और हिसाव,
सतलज, व्यास, नर्मदा,
तपती और चिनाव,
ब्रम्हपुत्र नदी सोन है,
महानदी धर-ध्यान,
बाईस नदी मशहूर है,
अन्दर हिन्दुस्तान॥

स्रोत - लोकगीत, ग्राम बेला,
जिला- भोजपुर (आरा)

Saturday, October 17, 2009

जेलखाना !!

कितनी उल्टी दुनिया,
कितना उल्टा ज़माना,
जिन्हें होना था जेलखानों में,
उनके हाथों में है जेलखाना॥

रचनाकार - 'मिश्रा'

Monday, October 12, 2009

घायल

माना की खुश हुए तुम,
और चेहरे पर तेरे कोई शिकन नही है,
पर कैसे कह सकते हो दिल में,
जुदाई का कोई चुभन नही है।

तो क्यूँ ना जग को लाख बहने दिखा,
अपने हर गम पर जोरदार ठहाके लगाओ,
छाप छोड़ गई हैं यादें जो दिल में,
उन्हें मिटाओगे कैसे तुम ही बताओ।

कह नही सकते की दिल, तुम्हारा दिल,
सिर्फ़ तुम्हारा ही कायल है,
चोट तो दोनों ही दिलों पर लगी हैं,
दोनों ही तनहा और दोनों ही घायल हैं॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

Tuesday, October 6, 2009

कौन किस गली जा रहा है...

कौन किस गली जा रहा है,
अपनी तो राह वही है,
दिशा भी वही अपनी फ़िर,
कौन यह रास्ता भटका रहा है...

तुम देखो, के मैं दीखता हूँ के नही,
मैं देखूं की तुम दिखती हो के नही,
कोई और नही है राहों में फ़िर,
फ़िर किसका प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा है...

कभी मैं खामोश हूँ,
कभी तुम खामोश हो,
ये मधुर सी ध्वनि कैसी फ़िर,
कौन ये संगीत गुनगुना रहा है...

कुछ नही है मेरे पास,
कुछ नही है तेरे पास,
दोनों ही हैं खली हाथ फ़िर,
कौन तुम्हारा हाथ थामे जा रहा है...

तुम भी चलते हो रुक-रुक कर,
हम भी चलते हैं रुक-रुक कर,
जब दोनों हैं खड़े एकसाथ फ़िर,
कौन सा कारवां चलता जा रहा है...

आगे भी कुछ नही राहों पर,
पीछे भी कुछ नही राहों पर,
राह सुनी है दोनों तरफ़ फ़िर,
क्यूँ ये राही ठोकर खा रहा है...

हम भी अपनी गली जा रहे हैं,
तुम भी अपनी गली जा रहे हो,
दोनों की गलियां अलग, मंजिल अलग फ़िर,
"कौन किस गली जा रहा है....."


रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।

Saturday, October 3, 2009

मैं और मेरी तन्हाई

उदास फिज़ा आज मुझसे है कह रही,
आ चलें दूर दुनिया की नज़रों से।
चलें वहां जहाँ कोई और ना हो, बस
अपनी अकेली दुनिया, और तन्हाई...

ज़लता हुआ झूठा दीपक ना हो,
अंधेरे में बुला रही रौशनी ना हो,
रास्तो में दर्द के छींटे ना हों,
बस एक मैं और, मेरी परछाई...

वक्त का और इंतज़ार नही होता,
इन लम्हों में कुछ रूकती सी धड़कन,
फ़िर क्यूँ लगे ये दिल, चल चलें दूर,
बस एक मैं और मेरी रुसवाई...

उन मुकामों का किसे इंतज़ार,
जो तुझे तेरी मुक्कमल जहाँ न दे सकीं,
रगों में बहती ज्वलन से दूर,
बस एक मैं और मेरी तन्हाई....

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।

एक धुंधले से चेहरे से क्या पूछता हूँ...

मुझे जिंदगी का मतलब बतायेंगी,
क्या आप मेरे कुछ और करीब आएँगी?

मैंने रास्तो पर पत्थर को लुढ़कते देखा है,
क्या आप इस पत्थर को रास्ता दिखाएंगी?

हमने आप से मुखातिर होना चाह,
कहीं खता तो नहीं की, दानिस्ता,
ग़र शान में आप की कोई गुस्ताखी हुई हो,
छमा कर दें तो बड़प्पन, वरना सजा बतायेंगी?

हम आप के उत्तर का इंतज़ार करेंगे,
आप हमें याद करने में कितना वक़्त लगाएंगी?
कहीं इतिहास में हम एक मोड़ पर तो नहीं थे,
वक़्त का दामन छोड़, क्या उसी मोड़ पर आएँगी?

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'।

बात फूलों की...

फिर छिडी रात, बात फूलों की,
रात है या बरात फुलों की॥

फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फुलों की, रात फुलों की॥

आपका साथ - साथ फुलों का,
आपकी बात फुलों की॥

फूल खिलते रहंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फुलों की॥

नज़रें मिलती हैं, जाम मिलते हैं,
मिल रही है हयात फुलों की॥

यह महकती हुई ग़ज़ल मकदु,
जैसे सेहरा में रात फुलों की॥

फ़िल्म: बाज़ार
गीत: लता मंगेशकर एवं तलत अजीज़

लता मंगेशकर

"संगीत है स्वर इश्वर की,
सुर-साधना में है माँ शारदा का नाम,
रागी जो सुनाये रागिनी,
तो रोगी को मिले आराम॥"

-- लता मंगेशकर को समर्पित।
सौजन्य- अखिल भारतीय रेडियो (बोल: 'श्री अमिन सायनी')

Tuesday, September 29, 2009

मजबूरियां

....कुछ मजबूरियों का आलम देखो,
उन्हें देख कर भी मुस्करा न सके....
....और तो और अपनी दास्ताँ-ऐ-दिल,
मचले खूब, पर लवो पर छा न सके....

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।

Thursday, September 24, 2009

इनाम

ऐ रौशनी-ऐ-तवअब् तेरा नाम कौन ले,
दानिस्ता अपनी जात् पर, इल्जाम कौन ले,
अहल-ऐ-हुनर की जान पर बन आए भी तो क्या,
अता में मिले अगर तो, इनाम कौन ले॥

रचनाकार - 'कैसर'

Monday, September 21, 2009

कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है...

हमने भी इश्क के दायरे में शामिल होकर देखा,
इस दौर में एक सदमा अक्सर मिलता है,
मिलती नही वो, न उनका प्यार मिलता है, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥

छिपती छिपाती नजरो से भी बचकर उनके,
रस्ते पर एक दीवाना अक्सर मिलता है,
मिलती नही नज़रें, न रद-ऐ-अमल कभी, यहाँ,
कहीं प्यार तो कहीं पत्थर मिलता है॥

सुर्ख आंखों से मुनाकिस लालिमा पलकों में दबाये,
जोहती भी नही मेरे दर्द-ऐ-तवास्सु़त अब तो,
इश्क-ऐ-दौर में ये सदमा अक्सर मिलता है,
कहाँ प्यार, यहाँ तो बस पत्थर मिलता है॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।

Thursday, September 10, 2009

आजा रे.

अश्कों के बादल झूम के पुकारे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....

बिन तेरे लागे नाही रैना,
रंग नाही बिखरे, मन में ना चैना,
दूर ही से तू पर, झलक दिखा जा रे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....

परदेसी बालमवा तोरी नख तर जाऊ,
तेरी बलिहारी गीत-संगीत सुनाऊ,
चंद धडकनों की लाज बचा जा रे,
आजा रे, आजा रे, अब तो आजा रे.....

बांवरी भई तोरी राह जहोते,
पूछत हारी, तोरी ख़बर ना मोहते,
म्हारी लास में साँस जगा जा रे,
आजा रे, आजा रे, परदेसी घर आजा रे...

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।

Saturday, August 22, 2009

जग सुना सुना सा पराया सा लगता है.

क्यूँ सोचता हूँ तेरे बारे में अब मैं,
सब कुछ पराया-पराया सा लगता है,
जाने कौन सा मंज़र देखा है दिल ने,
खोया-खोया सा घबराया सा लगता है॥

आंसू आते भी नही और रुकते भी नही,
सैलाब जैसे दबाया सा लगता है,
राहगुज़र की बात क्या करूँ मैं,
आज हर अपना, पराया सा लगता है॥

अब तो महिना गर्मी का चल रहा है,
फ़िर ठण्ड क्यूँ आया-आया सा लगता है,
कितने अकेले हो गए हम अपनी राहो में,
आज हर रिश्ता पराया सा लगता है॥

कहते हैं की आइना हकीकत दिखलाता है,
पर आज आइना भी घबराया सा लगता है,
फूल मेरे हाथों का पुराना तो नही,
फ़िर आज क्यूँ यह मुरझाया सा लगता है॥

क्यूँ कोसते हैं लोग अँधेरी रात को,
आज तो सूरज भी शरमाया सा लगता है,
थोडी चांदनी है चिटक रही मेरे आँगन,
क्यूँ यह आँगन पराया सा लगता है॥

अकेले हैं भगवान् मन्दिर में ऐसे,
दुनिया का जैसे सताया सा लगता है,
खेवट क्यूँ रुकता है बीच नदी में,
आज क्यूँ यह पानी पराया सा लगता है॥

भागना तो तू भी जानता है ना वक्त,
आज क्यूँ रुका सा, सिथलाया सा लगता है,
मेरे आंसुवो का वज़न ना करा कभी,
यही तो अपना है, बाकी पराया सा लगता है॥

किस किस को गिनूंगा अपने दुश्मनों में,
हर दोस्त में दुश्मन आया सा लगता है,
तेज़ धुप में आज मेरी ही परछाई,
काली रात का घाना साया सा लगता है॥

खुशियाँ बची हैं कितनी नही जानता आज,
क्यूँ यह गला भर आया सा लगता है,
क्यूँ खामोश है जुबान मेरी आज,
हलक का हर शब्द हिलाया सा लगता है॥

आते आते जुबान पर दिल की दास्ताँ,
लम्हा लम्हा चित्राय सा लगता है,
अब बादल के बरसने का कैसा इंतज़ार,
जब हर मौसम ही पराया सा लगता है॥

कुछ खोया है मैंने, क्या खोया है मैंने,
आज जिंदगी अँधेरी छाया सा लगता है,
आंसुवो को भी पनाह नही मिलती चेहरे पर,
आज अपना ही चेहरा पराया सा लगता है॥

हर एक को देखता हूँ बड़ी तमन्ना से,
आज तो धड़कन भी दुसरे से चुराया सा लगता है,
नींद तो अब आती नही हमें रातो में,
जागते देखा हर सपना भी पराया सा लगता है॥

अपने पापो का दोष क्यूँ दू दुसरो को,
आज अपना ही जिस्म पराया सा लगता है,
क्यूँ इतना तरस खता है चित्रगुप्त मुझपर,
कभी प्राण आया, कभी जाया सा लगता है॥

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

Monday, August 17, 2009

बरसात

आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...

एक बूँद फ़िर बारिश की,
तपती भू की तृष्णा बढ़ा गई,
दूर बिजली चमकी आकाश में,
वो देखो बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...

खुशी के आगमन के पहले ही,
खुशियों की तैयारी छा गई,
एक और बूँद ठंडी सी,
धरती के दिल में समा गई...
आहा बरसात आ गई...

कुछ कच्चे आँगन के फलो को,
देखो कितना इंतज़ार करा गई,
पीपल के पत्तो से टपकी बूँद,
मिटटी की खुशबू बढ़ा गई...
आहा बरसात आ गई...
आहा बरसात आ गई...


रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

Friday, July 24, 2009

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है,
मैं भूखा सोता हूँ तो माँ भी भूखी सोती है,
एक रोटी ज्यादा मांग लूँ जो कभी मैं,
माँ कोने में आँखें भिगोती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

मेरी चारपाई की टूटी लकडी जब,
खट-खट कर मुझे जगोती है,
माँ तब हाथ में पाया थामे,
बैठे-बैठे ही सोती है....

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

सूखे खेतों में बरखा की आस में बैठे,
बछिया की भी आठ पहर होती है,
बनिए और महाजन की खरी-खोटी,
पापा के फटे जेबों पर बेअसर होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

मंडी के रस्ते में जब, बच्चे एकसाथ आते हैं,
तब स्कूल जाने को, हम भी तरस जाते हैं,
देख पापा की आंखों में लाचारी हम,
सोचते हैं अपनी, ऐसे तो गुज़र होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

बरसात की जब पहली बारिश,
छत से चू कर घर को भिगोती है,
तब माँ मुझको आँचल से ढक-कर,
बिन आंसू के ही रोती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

दीदी की शादी की कीमत, जब पंडित बताता है,
लड़की होने का ताना, दहेज़ बनकर आता है,
अपनी 'किस' भूल पर दीदी के दिल में,
देखो कितने अन्दर तक असर होती है...

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

Monday, July 20, 2009

अपना - पराया

कोई ताबीर ना उलटी होती,
हमने हर ख्वाब ही उल्टा देखा,
रंजिशें अपनों की याद आएँगी,
क्या कहूँ किसको पराया देखा।
शहर की इस भीड़ में 'कैसर' हमने,
एक-एक शक्श को तनहा देखा॥

रचनाकार - 'कैसर'

Monday, July 13, 2009

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल...

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल.....

तू देख आज चमन में है रौशनी,
तुझे पुकारे है और यह कह रही,
अब दुनिया की बन्धनों से बाहर निकल,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

तेरा मस्तक क्यूँ है झुका हुआ,
चेहरा उदासियों से घिरा हुआ,
तोड़ के इन बन्धनों को आगे बढ़,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

तू उठा ले जो कदम तो,
आज रास्तो पर फूल बिखरेंगे,
क्यूँ करता है तू कल की फिकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

रोशन होगा तेरे कर्म से आज आज शमा
खिल उठ्येंगी बगियाँ, जाएगा तू जहाँ,
धर्म जात् को दरकिनार कर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ना सोच के तू कभी अकेला होगा,
तेरा इतिहास तुझसे कुछ नही पूछेगा,
अपने जेहन में विस्वास की चिंगारी जगाकर,
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....
ऐ मेरे मन् कहीं दूर चल....

रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

Wednesday, July 8, 2009

यूँही कभी ....

अपने होठों की हँसी चुनने की जब बारी आई,
तो आँखों के सामने एक सपना आया,
समंदर से सैलाब बह गया जाने क्यूँ,
तुम याद आए, यूँही कभी...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥

और तो कुछ नही, तेरा चेहरा था सामने,
कुछ पलकों से चिपकी ओस की बूँदें,
और हांथो में मेहंदी लागाये,
तुम याद आए, बस याद आए...
यूँही कभी जब तुम याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥

जाने क्यूँ सोचा कुछ लम्हा चुरा लूँ,
इतिहास के पन्नो से तुम्हे उठा लूँ,
जिगर-बंद कर लूँ उन धडकनों को,
जब तुम याद आए, बस याद आए,
हाँ याद आए, बहुत याद आए।
यूँही कभी जब तुम याद आए॥


रचनाकार - 'आनंद मिश्रा'

Friday, May 1, 2009

अभी हारने की बारी नही आई....

जिंदगी बहुत बड़ी नही थी,
जीने की कोशिश किए जा रहा था,
किसी कदम पर लगता था की खुश हूँ,
पर गम के आंसू पिए जा रहा था॥

फ़िर एक दिन आँख खुली अक्ल की,
देखा अंधेरे में भटक मैं,
अपनी जिंदगी में अपनों से,
अनजान दूरियां बढ़ा रहा था॥

बेनामी जिद्द में ऐसा अकडा था,
हर कदम पर टूटता जा रहा था,
कभी नींद नसीब होगी चैन की,
इसी इंतज़ार में नींदें उदा रहा था॥

टूटने का असर तो दिल पर हो रहा था,
चहरे पर झुर्रियां क्यूँ बढ़ता जा रहा था,
शायदना मिलने वाली मौत की उम्मीद में,
जिंदगी से हार कर भी, बस जिए जा रहा था॥

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पर एक उम्मीद है अभी बाकी,
अभी देखा है जिंदगी का आधा सच,
बाकी आधा तो देखना है हंसकर,
फ़िर क्या करूँगा इतनी जल्दी मरकर॥

नही-नही मैं अभी नही मरूँगा,
जिंदगी से अभी समझौता नही करूँगा,
उसने जितने तीर थे तरकस में चलाये,
पर मेरी निष्ठां को नही डिगा पाए॥

कल तो किसी ने नही देखा है जानता हूँ,
फ़िर आज क्यूँ मैं हार मानता हूँ,
हर राह पर मैं जीत तो नही सका,
पर अभी हारा नही हूँ यही मानता हूँ॥

मैं आऊंगा और सर उठा कर चलूँगा,
हर गली से अपनी विस्वास की ऊँगली पकड़ निकलूंगा,
तुम भी मिलोगे रस्ते पर कहीं, मेरे मुक्कदर,
इंतज़ार करो, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा।
हाँ, कल मैं फ़िर अपना परिचय दूंगा॥


रचनाकार - 'आनंद मिश्रा' ।

Monday, April 6, 2009

आप किस मुद्दे पर वोट देना चाहेंगे?

आम चुनाव मुह खोले खड़ा है, यह वो समय है जब हमारा एक फैसला हमारे लिए आने वाले पाँच वर्षो तक अपनी छाप छोड़ता रहेगा। चाहे बुरा हो या भला हो, पर इस चुनाव का आसार तो सिर्फ़ हम पर ही पड़ेगा, क्यूँ की हम ही तो मध्यम वर्ग के इंसान हैं। हाँ मध्यम जिसकी सिर्फ़ एक जिम्मेदारी है यहाँ के लोकतंत्र में, वो है वोट डालने की। और एक जिम्मेदारी जो मध्यम बर्ग ने उठा राखी है वो है, पाँच साल तक इंतज़ार करने की की अगला वोट कब डालेंगे जब उनको कुछ लोग मुफ्त में उपहार और भोजन देंगे। वैसे भी, इसके अलावा और कुछ की समझ हो भी नही पाई है हम मध्यम बर्ग को। तो, सवाल यह है की आप, यानी मध्यम्बर्ग किस मुद्दे को ध्यान में रख कर वोट कर रहा है? उदहारण के लिए मैं कुछ मुद्दों को याद दिला रहा हूँ जो आप के वोट देने की वज़ह हो सकते हैं शायद। बेरोज़गारी, महंगाई, धर्म, जाती, विकाश, कोटा, आरक्षण, गरीबी इत्यादि-इत्यादि...
मैंने बहुत सोचा, और सोचा तो यह पाया की हर हालत में हमें इस बार वोट डालने के लिए सबसे पहले हमें अपनी समझ से यह साबित करने के लिए वोट डालना है की हम बदल रहे हैं। हम अब किसी के हात के मोहरे नही हैं, और अपनी भलाई के लिए क्या करने और क्या नही करने की जरुरत है हम जानते हैं। किसी को यह बताने की या जताने की जरुरत नही है की हम किस को और क्यूँ वोट डालें। इस बार वोट डालने का सबसे बड़ा मुद्दा यह है की हम अब साधारण लोग नही हैं, या यूँ कहें की कोई विशिस्ट लोग नही हैं जो हमारा प्रतिनिधित्वा करेंगे। हम में से ही कोई एक हमारा प्रतिनिधि बनेगा और उसके नाम से हम नही, बल्कि हमारे विकाश से वो पहचाना जाएगा। मेरी पहली प्राथमिकता यह है की हर व्यक्ति इतना समझदार बने की सही और ग़लत का अन्तर वो बहुत आसानी से समझ सके। जरुरत आधिकार की नही है, बल्कि जरुरत पहले से ही प्राप्त अधिकारों को समझने और उनके इस्तेमाल करने की है। मैं किसी भी धर्म या जाती का पक्ष नही लेना चाहता हूँ, लेकिन कहना चाहता हूँ की अपने धर्म और जाती को मानना जितना जरुरी है उतना ही बाकी लोगो के धर्म और जाती का समान करना है। अतः धर्म और जाती के नाम पर इस बार का वोट डालने के पक्ष में मैं बिल्कुल नही हूँ, बल्कि मैं कभी भी उस के पक्ष में नही हूँ क्यूंकि यह तो पुरी तारक व्यक्तिगत विषय है की कौन किस धर्म या जाती का है। अशिक्षित लोगो में गिना जन मुझे एक गाली की तरह लगता है, इस लिए मैं यह नही चाहता हूँ की हम में से कोई भी अशिक्षित रहे। शिक्षा का सिर्फ़ अधिकार ही नही, बल्कि शिक्षा का विस्तार और शिक्षा का स्तर मेरे चुनावी मुद्दे हैं। २ या ३ रुपये किलो मिलने वाला राशन मेरा मोह नही आकर्षित कर सकते हैं, क्यूँ की इस बार का चुनावी मुद्दा यह नही है मेरा की कौन कितने रुपये किलो आनाज बेचेगा। मेरा मुद्दा है, हम में से कोई इस स्तर का गरीब हो ही क्यूँ की उसे किसी सरकार को चुनना पड़े जो उसकी गरीबी पर आनाज बांटने का दिखावा कर के हँसता हो।

कुछ ना होने का गम किसे है....

कुछ ना होने का गम किसे है,
अपनी तो यहाँ कुछ भी नही है हस्ती
कलम के दरोगा ने जो थामी है चुप्पी,
कहते हैं राम-रहीम चुनाव के नारे
चलती है जात-धर्म की चरखी,
बंटते हैं नोट, वोट के पहले
क्या मांगता हूँ मैं भिखारी,
नेता हमारी आवाज़ काहे को सुन ले
रुक जा, जा, हमारे करीब तू तो,
तेरी कमी है अब जिंदगी में,
हाँ जिंदगी, यही नही है अब जिंदगी में
कब बन गए हम अपने ही चुने हुए के दास,
ना अपनी अपना बची, ना बची आन
फ़िर भी हमने तेरे विरोध का राह नही चुना

Saturday, April 4, 2009

कहीं दीप जले कहीं दिल....

इतनी मंहगाई, और ऊपर से नौकरियों का खतरा,
इसमें कोई रसोई की गैस या गड्डी में पेट्रोल कैसे जलाये,
इसीलिए, मैंने भी यही सोचा है की दीप को जलने दो,
अमीरों के गलियारों को रौशन करने दो, अपनी तो दिल जलने से भी चल जायेगी....

भले ही सरकारी दफ्तारोके चक्कर काटते काटते,
और प्राइवेट नौकरियों के गलियों से हमारी जिंदगी अंधेरी हो जाए.....
हमारे मेहनत से दिया टैक्स और उसकी मंगाई पेट्रोल पर तो नेताओ का ही आधिकार है....
वे ही इन्हे जलाये, वे ही रोशनी पाए.......

क्या फर्क पड़ता है, हमारे पास तो जलाने के लिए दिल है ही.....
भले किसी नारी की वज़ह से, या आपसी रंजिशो की वज़ह से.....
आख़िर टूटा हुआ दिल हम और करेंगेभी क्या,.....
सो इसे ही जला जला कर हम अपना जहाँ रोशन करते रहेंगे.....

और हम जैसो की तो कमी भी नही है.......
ना चाहो तो भी हम जैसो से ही हर रोज़ सामना हो जाए.....
हम दिलजले तो हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं.....
यही मुक्कदर है की, कल भी जले थे, आज भी जल रहे हैं.....

रोक सकता कोई तो रोक लेता जलने से इनको....
पर वो भी सम्भव नही है.... यही दिल जलना चाहे तो कोई क्या करे...
दिल की आग बुझाओ, आग लगनी है तो पेट्रोल और गैस में आग लगाओ....
फ़िर साथ में सुर लगायेंगे..... कहीं दीप जले कहीं दिल....

Wednesday, March 11, 2009

मैंने कब रोका है...

मैंने कब रोका है तूफानों को चलने से,
मैंने कब रोका है अरमानो को पिघलने से,
मैं तो कहता हूँ लगा दो आग जितनी दिल में हो,
मैं तो कहता हूँ दिखा दो प्यार जितनी दिल में हो॥

देखना वक्त ख़ुद-ब्-ख़ुद तुम्हारा गुलाम हो जाएगा,
एक कसक सी जागेगी दिल में और दिल मचल जाएगा,
आरजू तो तुम्हारी भी यही है इजहार-ऐ-काफिर,
फरमा के देखो, दिल तो दिल है, पत्थर भी पिघल जाएगा॥

कौन रोका है मुझे आसमा पर चढ़ने से,
पर तुम भी नही आई, तन्हाई में बुलाने से,
तमन्ना थी की आखरी साँस में तुम्हारा आगाज़ हो,
अब कफ़न भी तनहा रहता है तेरे चले जाने से॥

- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'

Tuesday, March 10, 2009

दोस्तों के बीच छिटके कुछ पत्र

पहला पत्र : अमित सिन्हा द्वारा

"क्यूँ रखूं अपने कलम में स्याही,
जब कोई अरमां दिल में मचलता नही।
ना जाने क्यूँ सब शक़ करते हैं मुझपर,
जब कोई मुस्कराते चहरे के दर्द को समझता नही।
अगर मिले खुदा तो उससे मांगूंगा अपना प्यार,
पर सुना है कि मरने से पहले वो मिलता नही॥"


दूसरा पत्र : नीरज पाठक द्वारा

"एक दुआ खुदा से ये भी...

रहे हर पल मेरे कलम में स्याही,
कुछ कहानी तुमने लिखी कुछ मैंने बनाई।
शक़ की बुनियाद गहरी नही होती मेरे दोस्त,
मोह्हबत का दस्तूर ही है जुदाई।
खुदा क्या दिलाएगा मुझे मेरा प्यार,
तक़दीर से गिला उसको हो, जो मेरी न हो पाई।"



तीसरा पत्र : आनंद मिश्रा द्वारा

"क्या दुआ करुँ, क्या दवा करूँ...

क्या खुदा और क्या खुदा की खुदाई,
जब मेरे हाथ का कलम ही टूटा है,
तो कैसी कहानी और किस काम की स्याही।
मोह्हबत का राज़ बताने वाले ये भी बता,
किसने लिखी किस्मत और क्यूँ लिखी जुदाई।
चर्चा तो मेरे मरने पर भी बंद ना होगा,
फ़िर कैसा प्यार, और कैसी वफाई।"


- अपनी राय अवश्य दें -- धन्यबाद ।

कुछ दर्द भरे नगमे

तेरे रोने की ख़बर मेरे आंखों से यूँ निकलती है,
जैसे कोई दुल्हन बिदाई के आंसू में पिघलती है।
किसी कोने से लिपट के देखूंगा की ये मोती कितने महेंगे है,
और देखूंगा की क्या मेरी गरीबी इनको कभी खरीद पायेगी?

कुछ ना होने पर मेरी जिरह का जुगाड़ यही होगा,
आज ताज़ा है यह मोती, जरुर महंगा होगा।
मुझे देख कोई हँसता नही अब गलियों में,
हर मोड़ पर ये मोतियाँ कौडियों के भाव बिकती हैं।

सौदा तो मेरा कभी ना हो सका बाज़ार में,
आज तेरी बेवफाई को बिकते देखा इश्तेहार में।
चाहता था के सबकुछ खर्च कर तुझको पा लूँ,
ये ख्वाब था, ख्वाब ही रहा की तुझे अपना लूँ।

दूर की धुंध में अब दानिस्ता ही कोई चिंगारी दिखती है,
यह नई दुनिया है, यहाँ चलचित्र नही, चरित्र बिकती है।
हर घड़ी अपने को हताश अपने इतिहास में देखता हूँ,
पर तेरे मोतियों के पर्दों पार, पूरी दुनिया अँधेरी दिखती है।

तन्हाई का बादल हमें ही क्यूँ भिंगोता है,
क्यूँ तेरी तस्वीर से ही हमेशा गुफ्तगू होता है।
वक्त का हम और कर्ज़दार नही होना चाहते,
तुझसे जुदा हैं, पर तेरी जुदाई का गम नही खोना चाहते॥

- रचनाकार -- 'आनंद मिश्रा'

Saturday, January 17, 2009

एक मुद्दत से मुलाकात की तमन्ना कुछ यूँ पूरी हुई...

आए थे मुखातिर होने,
और दर्द को मेरे जगा गए।
वो, जिनके करीब थे हम,
हमसे दूरियां गिना गए॥

रोये भी वो, फ़ोन पर तो,
धड़कन अपनी सुना गए।
नज़र हमसे मिलाया नही,
मजबूरियां दिल की बता गए॥

कहाँ हम उनसे मिले आज,
वो तो, किस्सा दुसरो का सुना गए।
मुस्कराए भी मन-मसोस कर,
फ़िर, गीलीं पलकें झपका गए॥

पूछना था हाल उनका हमें,
वो हमें बेहाली की वज़ह ठहरा गए।
हमने कहा, हम कौन हैं अब,
वो घर का खाली कोना दिखा गए॥

ना हम उनसे, ना वो हमसे मिले,
ये उनकी ही मर्ज़ी थी आशात्।
मुलाकात तो किसी और से हुई,
हम तो, बस गए और आ गए॥

अब....... फ़िर यूँ तमन्ना, कभी........ जगे - न- जगे ...... ॥

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Wednesday, December 24, 2008

आ शाकी मुझसे मिल....

दर्द मेरा देख शाकी,
आ मेरे करीब आ।
रूह को न रख पीछे,
तन को ना आगे ला॥

मन् मेरा उदास था,
और उदासी ना बढ़ा।
मिलना है तो मुझसे मिल,
मेरी हँसी ना उड़ा॥

मैं भी नही, जो तू नही,
तू भी मेरे बिन पूरी नही।
भावनाओ को खिलने दे,
किसी को बीच में न बुला॥

पिघलते अश्क क्यूँ सुखाता है,
जज्बातों को यूँ ना तरसा।
आ शाकी मुझसे मिल,
आ मेरे करीब आ॥

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Tuesday, December 23, 2008

एक शेर अर्ज़ है...

आशियाने कब के हैं, उजड़ चुके,
अरमान कब के हैं, बहल चुके,
अब तो बस धडकनों का लिहाज़ है,
वरना हम तो कब के हैं, मर चुके।

कभी इस दिल में भी,
ख्वाबों की लौ रोशन रहती थी।
आंखों में सपने, और रगों में,
उमंगो की लहर रहती थी।

ना जाने ये कैसा मुकाम आया,
कि, उदासी फिजा में है, घुल चुकी,
और उजाले अंधेरे में हैं,
गुम हो चुके।

अब तो बस धडकनों का लिहाज़ है,
वरना हम तो कब के हैं मर चुके॥

रचनाकार - "अज्ञात" ।

दिल....

दिल के अन्दर जो कुछ भी है,
लव्जों में कब ढलता है।
दर्द लावो तक आते आते,
अपनी शक्ल बदलता है।।

यूँ तो जो आँखें खोलकर चलते हैं,
वो भी ठोकर खाकर गिरते हैं।
एक तेरा दीवाना ऐसा है,
ठोकर खाकर संभालता है।।

बादल बरसें या छंट जायें,
इनसे मुझको क्या लेना है।
दिल की हालत ऐसी है कि,
हर मौसम ही खलता है।।

बदल गया हर वक्त फ़िर भी,
दिल तुझसे ही बहलता है।
पत्थर तो पत्थर है, आख़िर,
न जलता है, न पिघलता है॥

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Saturday, December 13, 2008

थोड़ा रुकता हूँ, थोड़ा चलता हूँ.....

उन रास्तो पर पत्थर बहुत हैं,
जिनपर मैं संभालता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कभी अपनी बेखुदी का हश्र न सोचा,
अपने ही दिल की आग में जलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कोई मुझसा न होगा किस्मतवाला,
अब किसी किस्मत से नही डरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

क्या हूँ उनका, कौन हूँ मैं,
क्यूँ उनके आंसुओं से डरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

मैं कोई बर्फ का टुकड़ा तो नही,
फ़िर क्यूँ उनके पास आकर पिघलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

मेरे रस्ते के हमसफ़र सिर्फ़ वो हीं तो नही,
फ़िर उनके ही रास्तों से क्यूँ गुज़रता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

आज फ़िर मेरे रस्ते में एक पत्थर आया,
अब सिर्फ़ पत्थरों के बीच से गुज़रता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

क्यूँ देखता होगा, मुझे कोई आख़िर,
मैं कोई हीरा नही जो चमकता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

क्या पाया हमने उनको पाकर,
उनको खोने से इतना क्यूँ डरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कैसा पागल हूँ, दीवाना हूँ,
उनको सोचकर ही मचलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

कितना मासूम हूँ कैसे कहूं,
उन्ही की बातों से बहलता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

मैं कहीं वक्त का पर्याय तो नही,
क्यूँ अपने ही वजूद को तरसता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

अपने हंसने के दिन तो अब आते ही नही,
उनकी हँसी पर अब आए दिन हँसता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

चंद लम्हों की बात और होती है,
हर साँस में जीता और मरता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

अपनी राह का मुसाफिर मैं अकेला तो नही,
फ़िर सुनी गलियों से क्यूँ गुज़रता हूँ।
थोड़ा रुकता हूँ उनको देखकर,
उन्ही को देखकर चलता हूँ॥

यही सच है, मैं अकेला हूँ,
कभी चलता हूँ, कभी ठहरता हूँ।
सुनी राहों का वारिश हूँ,
क्या रुकता हूँ, क्या चलता हूँ॥

हर मोड़ पर किसको खोजता हूँ,
कभी आगे, कभी पीछे मुड़ता हूँ।
किसको देखकर थोड़ा रुकता हूँ,
किसको देखकर मैं चलता हूँ॥

सुनी राहों का वारिश हूँ मैं,
क्या रुकता हूँ, क्या चलता हूँ!!

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Thursday, December 11, 2008

गुजरने को....

और एक रात है गुजरने को,
छोटी सी मुलाकात है गुजरने को।
मौसम तो गर्मी का है आज, मगर,
आंखों में बरसात है, गुजरने को।

तुम्हे याद बहुत आऊंगा,
सच कहता हूँ, भूल न पाउँगा।
ये अपनी अपनी दिल की बात है,
वक्त से मजबूर होकर, हालात है गुजरने को।

जाना तो इस कदर न, कि फ़िर लौट कर ना आना,
तुम्हारे बिन ये दिल नही करता, सँवरने को।
कुछ लम्हे बचे हैं, जी लेते हैं हम सोचकर,
आज की रात, आखिरी रात है, गुजरने को।

तेरे लौट के आने तक, तेरे जाने के बाद,
कल की शाम तुझ संग बिताने के बाद,
क्यूँ ऐसा लगता है मुझको अक्सर,
बड़ी लम्बी हर रात है, गुजरने को॥


रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Saturday, December 6, 2008

आहिस्ता आहिस्ता.....

तुमने ना देखा की चिराग बुझता गया,
तनहाई में तुमसे जुदाई का गम बढ़ता गया,
फ़िर बारिश की बूंदों ने यूँ याद किया हमें,
कोई सुलगता एहसास जैसे, आहिस्ता आहिस्ता।

खोये को याद करके सहमता रहा,
मिलने की चाह में तड़पता रहा,
जैसे नज़रों से दूर होती जिंदगी,
एक ओर झुकता यौवन, आहिस्ता आहिस्ता।

आज लाल गुलाब की पंखुडियों का खिलना,
हमारे वजूद के मिटने का इशारा करती हैं,
वक्त पर हम ही न समझ पाए दिल्लगी का आलम,
बेवाफई की कहानी सुनाऊ, आहिस्ता आहिस्ता।

दुनिया का दस्तूर ही है भुला देना,
तू भी मुझे, मेरी याद को भुला देना ए नूर-ऐ-जहाँ,
हम भी तुम्हे पाने की ख्वाइश मिटा देंगे,
आज हसकर मगर, आहिस्ता आहिस्ता॥


यह रचना नीरज की रचना 'तुम याद आए' के जबाब में मैंने लिखी थी .............

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Thursday, December 4, 2008

हे भारत के पार्थ उठो अब

हे पार्थ उठो, अब बहुत हुआ,
चलो कि शत्रु ललकार रहा है,
रणभेरियाँ बज उठी अब,
जन-मानस तुम्हे पुकार रहा है।

कुरुक्षेत्र बन रहा है भारत,
निकलो महाभारत की कहानी से,
आज कौरव आए पानी से, देखो।
टूट न जाए गांडीव ग्लानी से।

चलो मैत्री बहुत हुई अब,
अब हो जाए, विजयी कलकारे।
देव-दूत, शान्ति-दूत, सब हारे,
अब बस पुरुषार्थ है फ़ुफ़्कारे।

अपने शस्त्रों पर प्रत्यंचा चढा दो,
कौरवो के अंत का बिगुल बजा दो।
गरुड़, हंस, ब्रह्मोस, सूर्य और पृथ्वी,
क्रोध की अग्नि, नापाक जमीं पर बरसा दो।

राजनीती, कूटनीति, सब नाकारी,
अब बस ध्वस्त करने की बारी।
कर्म को कुकर्म पर विजय दिला दो,
कौरवो पर अपनी ध्वजा लहर दो।

द्रोण, पितामह कोई गैर नही हैं,
हमारा भी उनसे बैर नही है।
पर अपने घर के शकुनी को पहचानो।
रिश्ते त्यागो, शत्रु पर निशाना तानो।

हे भारत के पार्थ उठो अब,
द्वेष, कलुष, मतभेद मिटा दो।
दक्षिण से कश्मीर लहुलुहान है,
जख्मो पर विजय का लेप लगा दो॥


रचनाकार - सुमित्र कुमार (फौजी)।

Wednesday, December 3, 2008

चित्रकला प्रदर्शनी

अचानक ही हमारे शहर में,
चित्रकला की एक प्रदर्शनी लगी।
औरो की भांति हममें भी,
देखने की अभिलाषा जगी।

निकल पड़े कदम राहों पर,
लिए उत्सुकता मन की निगाहों पर,
जगी लालसा और अंकुर फूटे,
उतेजना जगी अपनी चाहो पर।

भीतर जाकर फ़िर हमने देखा,
नारी तन पर कोमलता की रेखा।

नख इतने श्रृंगार भरे थे,
मनो उनमें सितार जड़े थे।

कर मेहंदी कर कृष्ण कड़ा,
चूडियों का रंग मोहक था बड़ा।

हिरनों के मनमोहक चछु के,
छींटे पलकों पर दीखते थे,
मानो परियां मदहोशी में थिरकना,
इन्ही पलकों पर सीखते थे।

लवो का खुलना, और सिकुड़ना,
फ़िर होठो का यूँ कुतराना,
बिन बोले हर अदा जताए,
ना हो, हाँ हो, या हो शर्माना।

पतली कमर, गोरा सा उदर,
वक्ष पर था कइयो का मिट जाना,
लिए तन पर यौवन का जोश,
हर अंग था दक्ष कला का नजराना।

खुरापाती मन मेरा मचला,
हाथ तस्वीर के वक्ष पर उछला,

अचानक ही सन्नाटा सा था छा गया,
लगा, भूचाल सा था आ गया।
मुझपर जैसे वज्रावार पड़ा था,
मैं लाचार सा घुटनों पर खड़ा था।

सर उठाके ज्यूँ मैंने देखा,
कल्पना के चादर को उतार फेंका।

सामने कोई तस्वीर नही,
मेरे जीवन की तकदीर पड़ी थी,
फ्रेम तो पूरा खाली था,
फ्रेम के पीछे मेरी बीबी खड़ी थी।

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

...............................................
*******कृपया इसे सिर्फ़ हास्य के रूप में लें*******

Sunday, November 30, 2008

तुम याद आए...

कल, इस बारिश में,
जब भींगे तनहा अकेले।
तुम याद आए....
बस याद आए....

कठौती में जमा हर बूँद
मेरी बेरुखी की दास्ताँ है।
बाकी बिखरे हुए कहते हैं, कितना.....
मुझे तुम याद आए.......

पानी में धुलती हरी हरी घास,
मिट्टी के गलियारे... और धुलती मिट्टी....
तेरे कदमो के निसान ढूंढेंगे।
तुम उन्हें भी कितना याद आए......

बारिश अब रुक चुकी है.....
सबकुछ कितना पवित्र और साफ़ है....
हरे हरे पत्ते .... हरे हरे रास्ते .....
सबकुछ कितना नया है......
बारिश की वो आखरी बूँद....
जो उस गुलाब से लिपटी हुई है....
जिसे इंतज़ार है..... तेरे लवो का जो...
हमेशा की तरह.....
आकर उन्हें चूमेंगे ..... और यह लाल गुलाब.....
शर्मा के गुलाबी हो जाएगा......

रचनाकार - नीरज पाठक।

कुछ सवाल अपने वजूद से

दाग लगा जो दामन में
फ़िर उसे मिटाना क्या....
सब जानते हैं हम बुजदिल हैं तो,
वजूद अपना जताना क्या...
एहसास तो तुमको भी होगा दोस्त,
मेरे कसूर का,
तुम मानते ही नही,
तो तुम्हे बताना क्या....

आज फ़िर मैं,
खयालो में गुम हूँ,
जब से हूँ, अकेला हूँ,
अकेलेपन से घबराना क्या....
दुश्मन हूँ और,
कायर भी हूँ...
फ़िर मरना क्या,
और मिटाना क्या....

तेरे द्वार पर हम अपना,
दिल छोड़ जायेंगे,
बिन तेरे जिसकी,
धड़कन क्या, धडकाना क्या....
उलझ जाए मेरी परछाई,
तेरे साए में...
फ़िर जिस्मो का
लिपटना क्या, और सिमटना क्या...

जब दौड़ ही चुके हैं,
बुढापे की दौड़...
तो चेहरे की
झुर्रियों से शर्माना क्या....
अपने राहो की
मंजिल आज कोई नही,
फ़िर युहीं रुकना क्या,
और चले जाना क्या......

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

गीत वही गाता हूँ....

कुछ अर्ज़ किया है,
कुछ दुखडा सुनाता हूँ....
आज रात नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....

तुम्हारे चेहरे पर कसक सी देखि,
चाहा तुम्हे मर्ज़ की दावा दिलाता हूँ.....
आज नए राह पर खड़ा हूँ....
पर गीत वही गाता हूँ......

चाहा था तुमको भी चाँद से देखूं,
हकीकत नही, सपनो की बात बताता हूँ....
आज हालात् नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....

कभी अपनी उमर तुम्हे दे दूँ...
कभी तेरी वफाई के राग सुनाता हूँ.....
आज बात नई है फ़िर से....
पर गीत वही गाता हूँ.....

मेरा मुक्कदर किस ने लिखा...
तुम्हे अपना मुक्कदर सुनाता हूँ...
आज मंजिल नई है फ़िर से...
पर गीत वही गाता हूँ.....

रचनाकार - आनंद मिश्रा।

Saturday, November 29, 2008

मेरी पहली कविता - गोधरा कांड

संदार्व : गोधरा में दंगाइयों के कुकर्म के पाश्चात्य एक बालक की दास्ताँ

देखा, ना देखा,
देखा ना गया,
वर्तमान की सीढ़ी ऊपर
उठकर आगे देखा ना गया...

मरी माँ नही ममता पड़ी थी,
तन जिसका कुचला था,
याद आया मैं नग्न,
उसके आँचल में उछाला था...

आब्बा नही पितृत्व था वो,
परवान चढा आस्तित्व जिसका,
समझ ना सका मैं हित किसका,
अहित किसका और निहित किसका...

सिद्ध किए थे श्रेष्ठता धारो की,
तलवारों वारो और हथियारों की,
याद आया इस परिस्थिति में,
अहमियत त्याहारो की,
होली दिवाली इद्द मुहर्रम
और बाटी खुशियाँ यारो की....

ज्यों देखा फाटक से बाहर आकर,
थमी साँसें वहां अपनों को पाकर,
गला रुंध गया था मेरा,
विरहां के मारो को खाकर....

अंग प्रत्यंग यूँ बिखरे पड़े थे,
मनो सुर असुर अमृत को लड़ये थे,
देख दृश्य हृदये यूँ डोला, बोला,
असुरत्व मानवता पर भरी पड़े थे...

रोया खोया मैं ऊपर देखा,
पतझड़ में खोझा बहार,
शांत लहू की धारा से भरे,
बर्तन ले लेते थे उभार....

अपरिचित सी इस अंजुमन में,
मैं चीत्कार रहा था बारम्बार,
कोई तो पुचकारे मुझको भी,
बाहों में ले और दे अपनों का प्यार....

सोच रहा था क्या हुआ यह सब,
क्यूँ हुआ, कोई तो समझा दे,
रक्त एक और वक्त भी एक,
फ़िर मजहब अलग क्यूँ, कोई तो बतला दे.....

हे इश्वर क्या ऐसा है की,
अब भी हम में मानवता कम है,
मेरी आँखें तो पथरा गई हैं,
क्या तेरी आंखों में पानी कम है....

कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है....
बचपन को कन्धा दे आया,
अब बारी ए यौवन तेरा है.....

कैसे देखूं वर्तमान के आगे,
की हर कदम पर टूटता दम मेरा है.....
हे इश्वर तेरी सर्वश्रेस्ट कृति,
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है.....
मानव का इसमें बसेरा है......

रचनाकार - आनंद मिश्रा।